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Monday, 2 January 2012

राजस्थानी की दुर्लभतम कविता "क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ राजस्थानी है"

इण नै माता रै पेट सुणी, इण नै पीढे पर लेट
सुणी,
पीळे पोतङियां मेँ पळकर, दायी-
दादी री कथा गुणी,
दादै रै हरख दुलारां मेँ, नानै रै माखण
न्हयारां मेँ,
मामै-मामी री प्यारां में, बाबलियै रै
बुचकारां मेँ,
नानी री कहाणी तो ओजूं, आखां नै आज
जबानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है॥1॥
भाई-भैणा में नाच-कूद, रंग आंख
मीँचणी रमता हा,
जागण-जम्मा अर रतजग्गा, जद सुण नै खातर
जमता हा,
पोसाळ पधारया गुरुवां री, मूंढै माथै
मरुवाणी ही,
जिण रै जरियै ही सूं सगळां,
हिन्दी अंग्रेजी जाणी ही,
जिनङी री मोटी नीव जमी, रूं-रूं मेँ
रमी दिवानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥2॥
इण में वीरां री वात मिलै, इण मेँ जौहर
री ख्यात खिलै,
चारण जैन्यां री चेतनता,
लिखियोङी पोथ्यां जोत झिलै,
सैणां-नैणां रो ग्यान लियां,
दातारी रो सणमाण दियां,
दिलदारी अक्कल में ऊंची, विस्वै में व्यापक
नांव कियां,
जिण सूं देवा-लेवो सीख्या, बड मायङ
भासा मानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥3॥
सेवा-सट्टां री सेनाणी, बीजक
हुंड्या री हेमाणी,
दरबारी पट्टां-पतरां री, नवनीत-रीत
री नेमाणी,
आसाम, ममोई ना अटकी, नंनण रै
खेती जा खटकी,
सिक्कम-गांटुक रै गैला मेँ, वाणिज मेँ
बिजली सी कटकी,
जग जीवट आदू अण्णभै सूं, पाई धाखङ
जिनगानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है॥4॥
रही माऊ कळाकारां री, है हाऊ दुसमण
सारां री,
आ: ताऊ तामसकारां री, नातेली सागण
न्हारां री,
सुख री भोमी री साख चि'णो,
मीठी मधरी नग आंख मिणो,
धन राजस्थान सुख रुप धनी, मन-माळव मात
जबान गिणो,
भासां रै इतिहासां उज्जळ, विग्यान
मनां रजधानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥5॥
प्राचीन काळ सूं सरस पगी,
हिन्दी साहित री नींव लगी,
भल सौरसेनी अप भ्रंस जणी, जिण सूं
ही ब्रज अर खङी जगी,
रासां री रीत पुराणी है,
सन्तां म्हंता पैंचाणी है,
गाथां गीतां रा भेद घणा, हद गौरव
पुखता पाणी है,
जूनापै में कुण होङ करै, गद्य-जात सैंग
लजखानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥6॥
गुरुदेव रवीन्द्र सुण रीझयो, मैमा माळवीय
हांफीज्यो,
सर टॉड ग्रियर्सन दिल सीज्यो,
तैसीतोरी भणकर भीज्यो,
चाटुरज्या इण नै चावै है, धीरेन्दर जी मन
भावै है,
गुण गावै भासा विग्यानी, दो क्रोङ
मिनख मूं बावै है,
देखण नै दुनिया राजी है, भाजी आवै इण
कानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥7॥
ख्यातां-वातां रा भंडारा, बचनिका,
वेलि रा गुण न्यारा,
भरपूर भारती दसा-रसां, परवाद सतसई सै
प्यारा,
सतरंगी साहित धारा है, लेखक
कवियां री करणी है,
भवसागर पार उतरणी है, भावां गुण-
गरिमा-तरणी है,
ओंळमै, कळायण, कुरजां, लू, मरुवाणी वीर-
भवानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है॥8॥
इण सूं ही बाबू साहब वणै, अर अवस वडा नर
वाजै है,
खावां-भावां, पैनावां री, रग-रग में
भासा साजै है,
संस्करती सब्दा सागण है, पर
परकरती बदळावै है,
मां दूध तणा जो तत्व मिलै, कद
छयाळी दूधां पावै है,
पण आदत सूं मजबूर हुया, गळ गिट-पिट राग
मिलानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥9॥
मायङ रो दरजो ऊंचो है, मायङ रो करज
समूचो है,
कुण काढै इण मेँ खूंचो है, लिखतां कुण पकङै
पूंचो है,
पर आः बूढी माता दाई है, दूजोङी धण
जोबन छाई है,
हम-तम, इंगलिस अपणावणियां, मायङ सूं लज
मैमा पाई है,
कळजुग मेँ हुया कपूत घणा,
जो बहुवां रा वरदानी है।
क्यूं भूल रिया निज भासा नै, जो मायङ
राजस्थानी है ॥10॥
- सा. म. श्री नानूराम संस्कर्ता
Ledger Typed by - Dr. Madan Gopal
Ladha

Tuesday, 20 December 2011

आपणी निराळी राजस्थानी भाषा

राजस्थानी भाषा बातां री धिरयाणी।
बातां में बातां। पण बातां में तंत। तंत
बी इत्तो कै अंत नीं। बोल्यां मूंडै मिठास।
अंगेज्यां उच्छाब। अर बपरायां हिमळास।
पण बोलण में सावचेती री दरकार।
दुनिया में राजस्थानी ई
ऐड़ी भाषा जकी में हरेक क्रिया सारू
निरवाळा सबद।
संज्ञावां रा न्यारा विशेषण। क्रिया अर
संज्ञा सबदां री आपरी कांण। आ कांण
राख्यां ई सरै। नींस अरथ रो अनरथ होय
जावै।
राजस्थानी भाषा में फूल नै पुहुप कैइजै। जे
आप कैवो कै म्हैं फूल ल्यायो हूं।
तो बडेरो मिनख टोकसी कै फूल
ल्या बडेरां रा। ओ तो पुहुप का पुस्ब है।
पटाखो फूटै नीं, छूटै। बंदूक बी चालै नीं, छूटै।
भांडा साफ नीं करीजै, मांजीजै। फूस
बुहारीजै अर झाड़ू काढीजै। मोती चमकै नीं,
पळकै। ढोल ढमकै। बाजा बाजै। बंदोरो कढै
नीं, नीसरै। विदाई नीं, सीख दिरीजै
का लिरीजै। नेग दिरीजै-लिरीजै।
जिनावरां री बोली रा बी सबद न्यारा-
न्यारा। डेडर डर-डर। चीड़ी चीं-
चीं का चींचाट करै। कागलो कांव-कांव।
घोड़ो हींसै। गा ढांकै। गोधो दड़ूकै। ऊंठ
आरड़ै-गरळावै। भैंस रिड़कै। गधियो भूंकै।
कुत्तो भूंसै। सांढ झेरावै। बकरियो बोकै।
जिनावरां रै बच्चियां रा नांव
भी निरवाळा। कुत्तै रो कुकरियो,
हूचरियो का कूरियो। सांढ रो टोडियो-
तोडियो। भैंस रो पाडियो। भेड
रो उरणियो। गा रो बछड़ियो, टोगड़ियो,
लवारियो, केरड़ो। आं रा स्त्रीलिंग-
कूरड़ी-हुचरड़ी, टोडकी-तोडकी, पाडकी,
बछड़ती। डांगरां रा नांव ओज्यूं है। गा-
बैडकी। भैंस-पाडी, झोटी। सांढ-टोरड़ी।
घोड़ी-बछेरी।
पसुवां रै गरभ धारण करण
रा बी पाखती नांव। भेड तुईजै। सांढ
लखाइजै। गा हरी होवै। धीणै होवै, दूध रळै,
नूंई होवै, कामल होवै, साखीजै, गोधै
रळाइजै, गोधै भेळी करीजै। भैंस गड़ीजै।
पाडो छोडीजै। पाळै आवै। घोड़ी ठाण देवै।
आं नै काबू करण रा नांव भी न्यारा-
न्यारा तरीका, न्यारा-न्यारा नांव।
गा रै नाजणो-न्याणो। भैंस रै पैंखड़ो।
घोड़ी रै लंगर। ऊंठ रै नोळ बीडणी। घोड़ी रै
नेवर। बळधां रै दावणा देईजै।
राजस्थानी में उच्छबां रा। तीज-
तिंवारां रा। मेळां-मगरियां रा। रीत-
परम्परा सारू आपरा सबद। बनड़ो गाइजै।
जल्लो गाइजै। चंवरी मंडै। हथळेवो जु़डै।
घोड़ो घेरीजै। बारणो रोकीजै। सामेळो-
समठूणी करीजै। तागा तोड़ीजै।
पागा पूजीजै। ढूंढ माथै तेड़ीजै।
जच्चा गाइजै। भाषा भाखीजै। कूंत करीजै।
झाळ अर तिरवाळा आवै। होळी मंगळाइजै।
बीनणी बधारीजै। कूं-कूं चिरचीजै। धोक
लगाइजै। पगां पड़ीजै। जात लगाइजै।
फेरी देइजै। झड़ूलो उतारीजै।
चेजो चिणाइजै। माल-बस्त मोलाइजै।
गांवतरो करीजै। खळो काढीजै। रळी आवै।
चे़डा आवै। भूत बड़ै। बायरियो बाजै। पून
चालै आंधी आवै।
इण बात माथै बांचो धोंकळसिंह
चरला रो ओ दूहो-
धन धोरा धन धोळिया, धन मरुधर माय।
मरुधर महिमा मोकळी, वरणन करी न
जाय।।


सुशील सिहाग
घूमरवाली, श्रीगँगानगर

Sunday, 11 December 2011

डॉ. मदन गोपाल लढा

Dr. Madan gopal Laddha explains his marvellous view in his antic
poems. He expreses his deep sense and heartly feeling with Rajasthani
language which is called are "MAYAD BHASHA". In this way the gives
full support to increase rajasthani culture and language. He is rising
star of rajasthani poetry.
In this poetry the poet- expreses his meditative attitude. He recalls
his childhood as a philosopher. He talks about his colony which is
called "guvad". When his friend calls him to walk anywhere but he
reply that 'NO'. I have walked to everywhere in the world through my
little poem.
When he utters about a well where some women go to fetch water,
he mentions to well as a ancestor, he remarks it is very old as his
village. But some poem he is suffered from homesickness. Frequently he
remembers his familz and a company of good friend where he spent his
almost time of day. But he have to live there because it is his
livelihood.
End of the finest poem "Udeeke pipal" in this poem the poet uses a
litreary term "personification". He mentions that a tree which is
pipal is our forefather's friend. It has much memory of them. He
loudly utters that tree calls us because it feels very alone that
whole village has gone to other place. There are merely many rubble
but it is responsible by our ansectiors that they gave it that it
lookafter and participate in our grief and joy. It calls please you
must meet me in real "I am alone in this period."
At last he says through the tree that when some new married couple
come to me through ritualistic. I give marry bless them and i will
free from my responsibility and boundation.
It is very much incridiable fact and very fabulious thought of poet to
discover a grief feeling of our forefather through a tree. In this way
he represents map of village which is not present in the world map.
It is very dazzling example for a loving couple. When a beloved is
living in grief due to separation from her lover. She is crying that
when she watches his loving letter it give me more pain with his
rememberance. She utters that your letters are kept in box with red
clothes. It is great treasure of your true and deep heartly love in
this matter her lover is living in foregien land. She looks letter it
looks like new and fresh but it is not so. His letter is gives her
sizzling feeling and new strength for wait of him.
In conclusion i want to say that the poet Mr. Laddha has a very high
and deep sense of emotion and he gave many incridiable example and
fact which are present in our emotion life.

GIRIJA SHANKAR JOSHI
M.A. , B. Ed.
MAHAMANDIR, JODHPUR

Thursday, 8 December 2011

खड़कौ


जगमग बजार । च्यारुंमेर च्यानणौ । भारी भीड़ । गाड़ी-घोड़ा मावै ई कोनी । दियाळी रै मौकै लोग नूंवी जिनसां बपरावण सारु बजार में उमड़ जावै । भांत-भंतीली दुकानां सजायोड़ी । कठै ई मिठाई, कठैई पटाखा, कठैई कपड़ा-लता तौ कठैई रमतिया । गिराकां नै बुलावण सारु लोडस्पीकर न्यारा बाजै । मतळब बजार में रुणक ई रुणक ।
पटाखां री दुकान माथै मेळौ मंड्योड़ौ । पटाखा ई हजार भांत रा । टिकड़ी, फुलझड़ी, सूतळी बंब, घूम चकरी, रंग-बिरंगी अनार, गंगा-जमना, सीटी , लाल लड़ी, हथगोळा , तीर अर नीं जाणै कांई-कांई । नांव चेतै राखणा ई मुस्कल । गिरक आवै अर देखतां-ई-देखतां झोळौ भर ’र ले जावै ।
 "बिल किता रौ ?"
 "सात सौ रीपिया ।"
 ".... .... ...."
 "आपरा हजार हुग्या सा !.... बेसी क्यांरा है ? जी खुस हुय जावैला । पटाखा रा धमीड़ बाजसी तौ पाड़ौसी मूंड़ौ लुकौ’र सो जासी । बास आळा बात करैला !... ऐक ई पटाखौ फुस्स हुयजै तौ पूठा ल्या’र न्हाख दिया ! ठेठ शिवकाशी सूं माल मंगायौ है । चीज रा दाम लागै । साल में ऐकर आवै दियाळी । टाबर रौ जी करग्यौ , काठ ना करौ ...."
 दुकान रै ऐन साम्ही ऊभौ गणपत पटखां कानी ललचाई निजरां सूं तकावै । दस रीपिया रौ ऐक नोट उणरी जीवणी मुट्ठी में भेळो करयौड़ौ ।बौ मनोमन पटाखा छांटै-लड़ी........ नीं चक्करी....... तीर ठीक रैसी...... गंगा जमना रौ धमीड़ तकड़ौ हुवै !
 पण मटी में फसत दस रीपिया । बेसी लावै ई कठै सूं? आ तौ भली हुई के काल नरेगा रौ हफ्तौ मिलग्यौ अर मा उणरी रीगळ्यां सुण’र टूठगी, नींतर मोठ री छिंया बैठ्यौ रैवौ भलां ई ! मा नै ई के औळमौ? बा कठै सूं ल्या देवै हुंडी ? ऐकली लुगाई सारु पांच जीवां री गुवाड़ी धिकाणी कोनी । इण मूंघीवाड़ै में बड़ा-बड़ा रा डेरुं बाजै । किंया थाकौ धिकावै, आ तौ बा ई जाणै !
गणपत चेतै करै जद उणरा बापू दियाळी पर घरै बावड़ता तो ऐक झोळौ पटाखा ल्यावता । पण अबै बापू ई कोनी रैया तो कुण ल्यावै पटाखा ! बापू कैवता - "थूं तो पटाखा छोड़े, म्हैं तौ सांचला गोळां ने छूटता देखूं !"
ऐक दिन बै खुद बंब री सीध में आग्या । महाजन फ़ील्ड फ़ायरिंग रेंज में स्क्रेप चुगतां ऐक जीवतों बंब  बां री जिनगाणी खाग्यौ । गणपत री आंख्यां बैवण लागगी । सात बरस बीतग्या । अबै बौ चवदै बरस रो हुग्यो । लारले सात बरसां मे मा कदी दिवाळी कोनी मनायी । मनावै ई कीकर ? उणरै जीवण में तौ अंधारौ ई अंधारौ है ।
घर में तो दियाळी कोनी धोकीजै, पण बीजे घरां में पटाखां रौ रोळौ सुण’र टाबरां रौ जी करै । ईण बात नै समझतां ई मा आज गणपत नै पटाखां सारूं दस रीपीया दिया है । बौ आधी घंटा तांई पटाखां कानी पसवाड़ै खड्यां तकावतौ रैयौ अर छेकड़ हिम्मत कर’र नैड़ै पूग्यो ।
"ओ सूतळी बंब किता रो है?"
"तीस रीपीया रौ, किता देवूं?"
"तीस रौ है, पण म्हारै खनै तौ फ़गत दस रीपीया है ।"
"दसरौ तौ टिकडया रौ डब्बो आसी ।"
"तौ अनार दे दयो !"
"चार अनारां रौ डब्बौ पच्चीस रो है । खुली कोनी बेचां ।"
"एक काढ देवौ नी !"
"कह दियो नीं खुल्ली कोनी बेचां । अबै मगज मत खा । आगै चाल ।"
दुकान पर गिराकां रौ जमघट लाग्यौड़ौ । इण भीड़ बिचाळै दस रीपीयां री पूंजी रै धणी नै कठै ठौड़ ? दुकानदार बांवड़ौ झाल’र बीं नै आगीनै धक्को दियो ।
"धंधा रौ टैम है । खोटी ना कर ! रास्तौ नाप थारौ...."
गणपत अण्मनौ सो आगै चाल पड़्यो, पण निजरां अजै ई पटाखां माथै टिक्योड़ी । बीं री आख्यां सीली हुयगी । थकां पीसा दुकानदार पटाखां सारू नटग्यो । बौ मनोमन अळोच करे- दस रीपीया ई किती मुस्कल सूं कबाड़्या है । मा तौ पांच माथै ई अड़्गी  । किता नौरा काढणा पड़्या । हजार खठै सूं लावूं?
बिना पटाखां घरै ई कीकर जावै ? गळी में पटाखां रा धमाधम बाजता हुसी । पटवारी जी रै घर रै आगे मगरियौ मंड्योड़ौ हुसी । मूळियौ, भंवरियौ,  सरबती आद हाथ में फ़ुलझड़यां लैर’र नाचता हुसी ।
फ़ुलझड़्या रो ध्यान  आवतां ई बि’रै मुंढै मूळक सांचारी, पण  अगले ई छिण भळे  उदासी बापरगी । बण सिसकारौ नाख्यो । मा बतावै,  बां रौ बाप तो पटवारी है । बो खुदो खुद सूं  बंतळ करै- ओ पटवारी कियां बणीजै? काईं मा पटवारी बण सके? फेर तो मौज बणजै । मोकळा पटाखां छोड़ूं । रोज नूवां गाबा ल्यावूं । मूळिये जिसी साईकल ई मंगावू ।
बो खुद सूं सुवाल करे- मा क्यू कोनी बणै पटवारी?
पण उथळौ कुण देवे?
बाज़ार में भीड़ बिचालै बो साव अकेलौ । बेमतलब  चाल्यां जावे । सामही चौराहो आग्यो । बीं रा पग थमग्या । आगे किनै जावणो है? चौराहे सूं च्यारूं दिस मारग फंटै, पण बीं सारू एक ई मारग कोनी ।
चौराहे रै सूवें बिचालै नेहरू जी री मूरती । धौळै संगमरमर सूं बण्योड़ी मूंढै बोलती मूरती । नेहरू जी रो मूळकतो उणियारौ । मूरती रै च्यारूं मैर  गोळाई में दूब लाग्योड़ी । दिन मे अठै लोगड़ा बैठया रैवै, पण अबार ऐन सूनेड़ ।
गणपत मूरती ने ओळखै । देस रा पेलड़ा प्रधानमंत्री चाचा नेहरू । पांचवी री पोथी में नेहरू जी री फोटू ही ।
सर जी कैवता- "नेहरू जी टाबरां रौ भोत लाड़ राखता । स्कूल छूटी तो पोथी पानड़ा ई छूटग्या । अबै तो जेठिये रै ढाबे माथे ऐंठा ठीकर धोय’र बगत टीपाणो है । जद बो मोटे बस्तो टांग्यां टाबरां ने पोसाळ जावता देखै तो उण रौ ई डाढौ जी करै । बो ई चमड़े रा काळा जूता पेर’र अर गळे में टाई बांध’र स्कूल जावणौ चावै, पण......। ओ ’पण’ उण रौ सबसूं मोटो दुसमी है । हरेक ठोड बीं रै सपनां नै चकनाचूर  कर न्हाखै ।
बीं नै रीस आ जावै । बो चाचा नेहरू री मूरती कानी तकावै । मनोमन सुवाल पूछे- कांई बे अबे ई उणनै लाड करै? काईं बे उणने बो’ळा सारा पटाखा दिरा सकै ?"
चाणचकै पटाखां री लांबी धमाधम सूं उणरौ ध्यान टूटै । स्यात कोई हजार पटाखां री बाल्टी रै तूळी लगाई हुवैला । बो गूंजे में हाथ घाले । दस रीपीया रौ मुड़्यो-तुड़्यो नोट अर एक दियासलाई री डब्बी । बो नोट हताळी पर सीधौ करै । नोट रे जीवणै पासे चस्मो लगायेड़ा मूळ्कता गांधी बापू । वौ गांधी जी नै ई ओळखै । सर जी केवता -"गांधी जी ई देस ने आजाद करवायो" ।
वौ खुद री आजादी रै बाबत सोचै । बीं नै आपरी मजबूरी पर झाळ आ जावै। बो नोट ने भेळौ कर’र पूठो गूंजै मे घाल लैवै । फेर बो डब्बी बारै काढै अर एक तूळी बेमतळब जगा’र हेठै फेंक दैवै अर कई ताळ तांई बि ने तकावतो रैवै ।
चाणचकै बो उभौ हुयो अर नेहरू जी री मूरती ने दिख्यां बिना पुठौ बाजार कानी चाल पड़्यो । खाथौ-खाथौ । गढ सूं डावड़ै मुड़तां ई पटाखां री दुकान ।
अबै बठै भीड़ कोनी, फगत २-३ जणा पटाखां रा मौल भाव करे हा । घणखरा लोग पटाखा लेग्या अर अबे घरे धमाधम करणै री बेळा ही । सेठ दुकान रै मायनै हिसाब-किताब में लाग्योड़ो अर सेल्समेन पटाखा बेचण मे मगन ।
गणपत दुकान सूं बीसेक फूट दूर ऐकर ठमयो अर पछै उंतावळा पगां सूं नेड़ै गयो । कणा गूंजे सूं दियासलाई री डिब्बी काढी अर कणा तूळी बाळ’र पटाखां माथै फेंकी, किं ठा कौनी पड़्यो । पण जद पटाखां री भड़ाभड़ गिगनारां गूंजण ढूकी तद सगळां रे काळजै खड़कौ हुयो । गणपत मुठ्ठी में थूक’र भाज छूट्यो ।
बां पटाखां री धमाधम कई ताळ चाली अर आखे कस्बे मे सुणीजी ।


डॊ. मदन गोपाल लढा



Wednesday, 16 November 2011

सूचना का अधिकार क्या है?



. सूचना का अधिकार क्या है?

 

संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत

सूचना का अधिकार मौलिक

अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1)

के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व

अभिव्यक्ति का अधिकार है. 1976 में

सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण

विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में

कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर

सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण

सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है.

इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे

कहा कि भारत एक लोकतंत्र है. लोग

मालिक हैं. इसलिए लोगों को यह जानने

का अधिकार है कि सरकारें

जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं?

व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है.

यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने

वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब

वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.

(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में).

नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने

का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार

खर्च हो रहा है. इन तीन

सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने

रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक

अधिकारों का एक हिस्सा हैं.

. यदि आरटीआई एक मौलिक अधिकार है,

तो हमें यह अधिकार देने के लिए एक कानून

की आवश्यकता क्यों है?

 

 

ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि आप

किसी सरकारी विभाग में जाकर

किसी अधिकारी से कहते हैं, "आरटीआई

मेरा मौलिक अधिकार है, और मैं इस देश

का मालिक हूँ. इसलिए मुझे आप

कृपया अपनी फाइलें दिखायिए", वह

ऐसा नहीं करेगा. व संभवतः वह आपको अपने

कमरे से निकाल देगा. इसलिए हमें एक ऐसे

तंत्र या प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसके

तहत हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कर

सकें. सूचना का अधिकार 2005, जो 13

अक्टूबर 2005 को लागू हुआ हमें वह तंत्र

प्रदान करता है. इस प्रकार

सूचना का अधिकार हमें कोई नया अधिकार

नहीं देता. यह केवल उस

प्रक्रिया का उल्लेख करता है कि हम कैसे

सूचना मांगें, कहाँ से मांगे, कितना शुल्क दें

आदि.

.सूचना का अधिकार कब लागू हुआ?

 

केंद्रीय सूचना का अधिकार 12 अक्टूबर

2005

को लागू हुआ. हालांकि 9 राज्य

सरकारें पहले ही राज्य कानून पारित कर

चुकीं थीं. ये थीं: जम्मू कश्मीर, दिल्ली,

राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,

कर्नाटक, तमिलनाडु, असम और गोवा.

सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से

अधिकार आते हैं?

सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक

नागरिक को शक्ति प्रदान करता है

कि वो:

सरकार से कुछ भी पूछे या कोई

भी सूचना मांगे.

किसी भी सरकारी निर्णय

की प्रति ले.

किसी भी सरकारी दस्तावेज

का निरीक्षण करे.

किसी भी सरकारी कार्य

का निरीक्षण करे.

किसी भी सरकारी कार्य के

पदार्थों के नमूने ले.

.सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से

अधिकार आते हैं?

 

केन्द्रीय कानून जम्मू कश्मीर राज्य के

अतिरिक्त पूरे देश पर लागू होता है.

सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य

कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के

अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर

सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के

हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त-

पोषित किये जाते हों.

. "वित्त पोषित" क्या है?

इसकी परिभाषा न ही सूचना का अधिकार

कानून और न ही किसी अन्य कानून में

दी गयी है. इसलिए यह मुद्दा समय के साथ

शायद किसी न्यायालय के आदेश

द्वारा ही सुलझ जायेगा.

.क्या निजी इकाइयां सूचना के अधिकार के

अर्न्तगत आती हैं?

सभी निजी इकाइयां, जोकि सरकार की हैं,

सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त-

पोषित की जाती हैं सीधे ही इसके

अर्न्तगत आती हैं. अन्य अप्रत्यक्ष रूप से

इसके अर्न्तगत आती हैं. अर्थात, यदि कोई

सरकारी विभाग किसी निजी इकाई से

किसी अन्य कानून के तहत सूचना ले

सकता हो तो वह सूचना कोई नागरिक

सूचना के अधिकार के अर्न्तगत उस

सरकारी विभाग से ले सकता है.

 

 

.क्या सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून

1923

सूचना के अधिकार में बाधा नहीं है?

नहीं, सूचना का अधिकार अधिनियम

2005

के अनुच्छेद 22 के अनुसार

सूचना का अधिकार कानून

सभी मौजूदा कानूनों का स्थान ले लेगा.

क्या पीआईओ सूचना देने से मना कर

सकता है?

एक पीआईओ सूचना देने से मना उन 11

विषयों के लिए कर सकता है

जो सूचना का अधिकार अधिनियम के

अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें

विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय

सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक,

वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से

हानिकारक सूचना, विधायिका के

विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने

वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार

अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18

अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये

लागू नहीं होता. हालांकि उन्हें

भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार

के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से

सम्बंधित हों.

 

.क्या अधिनियम विभक्त सूचना के लिए

कहता है?

 

 

हाँ, सूचना का अधिकार अधिनियम के दसवें

अनुभाग के अंतर्गत दस्तावेज के उस भाग तक

पहुँच बनायीं जा सकती है जिनमें वे सूचनाएं

नहीं होतीं जो इस अधिनियम के तहत भेद

प्रकाशन से अलग रखी गयीं हैं.

.क्या फाइलों की टिप्पणियों तक पहुँच से

मना किया जा सकता है?

नहीं,

फाइलों की टिप्पणियां सरकारी फाइल

का अभिन्न अंग हैं व इस अधिनियम के तहत

भेद प्रकाशन की विषय वस्तु हैं.

ऐसा केंद्रीय सूचना आयोग ने 31

जनवरी 2006 के अपने एक आदेश में स्पष्ट

कर दिया है.

 

१०. मुझे सूचना कौन देगा?

 

एक या अधिक अधिकारियों को प्रत्येक

सरकारी विभाग में जन

सूचना अधिकारी (पीआईओ) का पद

दिया गया है. ये जन

सूचना अधिकारी प्रधान अधिकारियों के

रूप में कार्य करते हैं.

आपको अपनी अर्जी इनके पास दाखिल

करनी होती है. यह उनका उत्तरदायित्व

होता है कि वे उस विभाग के विभिन्न

भागों से आपके

द्वारा मांगी गयी जानकारी इकठ्ठा करें

व आपको प्रदान करें. इसके अलावा, कई

अधिकारियों को सहायक जन

सूचना अधिकारी के पद पर सेवायोजित

किया गया है. उनका कार्य केवल जनता से

अर्जियां स्वीकारना व उचित पीआईओ के

पास भेजना है.

११.अपनी अर्जी मैं कहाँ जमा करुँ?

 

आप ऐसा पीआईओ या एपीआईओ के पास कर

सकते हैं. केंद्र सरकार के विभागों के

मामलों में, 629 डाकघरों को एपीआईओ

बनाया गया है. अर्थात् आप इन डाकघरों में

से किसी एक में जाकर आरटीआई पटल पर

अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं. वे

आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और

यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है

कि वो उसे उचित पीआईओ के पास भेजे.

 

१२.क्या इसके लिए कोई फीस है? मैं इसे कैसे

जमा करुँ?

 

हाँ, एक अर्ज़ी फीस होती है. केंद्र सरकार

के विभागों के लिए यह 10रु. है.

हालांकि विभिन्न राज्यों ने भिन्न फीसें

रखीं हैं. सूचना पाने के लिए, आपको 2रु.

प्रति सूचना पृष्ठ केंद्र सरकार के

विभागों के लिए देना होता है. यह

विभिन्न राज्यों के लिए अलग- अलग है.

इसी प्रकार दस्तावेजों के निरीक्षण के

लिए भी फीस का प्रावधान है. निरीक्षण

के पहले घंटे की कोई फीस नहीं है लेकिन

उसके पश्चात् प्रत्येक घंटे या उसके भाग

की 5रु. प्रतिघंटा फीस होगी. यह

केन्द्रीय कानून के अनुसार है. प्रत्येक

राज्य के लिए, सम्बंधित राज्य के नियम देखें.

आप फीस नकद में, डीडी या बैंकर चैक

या पोस्टल आर्डर जो उस जन प्राधिकरण

के पक्ष में देय हो द्वारा जमा कर सकते हैं.

कुछ राज्यों में, आप कोर्ट फीस टिकटें खरीद

सकते हैं व अपनी अर्ज़ी पर चिपका सकते हैं.

ऐसा करने पर आपकी फीस

जमा मानी जायेगी. आप तब

अपनी अर्ज़ी स्वयं या डाक से

जमा करा सकते हैं.

१२.मुझे क्या करना चाहिए यदि पीआईओ

या सम्बंधित विभाग मेरी अर्ज़ी स्वीकार

न करे?

 

आप इसे डाक द्वारा भेज सकते हैं. आप

इसकी औपचारिक शिकायत सम्बंधित

सूचना आयोग को भी अनुच्छेद 18 के तहत

करें. सूचना आयुक्त को उस अधिकारी पर

25000

रु. का दंड लगाने का अधिकार है

जिसने आपकी अर्ज़ी स्वीकार करने से

मना किया था.

 

१३.क्या सूचना पाने के लिए अर्ज़ी का कोई

प्रारूप है?

केंद्र सरकार के विभागों के लिए, कोई

प्रारूप नहीं है. आपको एक सादा कागज़ पर

एक सामान्य अर्ज़ी की तरह

ही अर्ज़ी देनी चाहिए. हालांकि कुछ

राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने

प्रारूप निर्धारित किये हैं. आपको इन

प्रारूपों पर ही अर्ज़ी देनी चाहिए.

कृपया जानने के लिए सम्बंधित राज्य के

नियम पढें.

 

१४.मैं सूचना के लिए कैसे अर्ज़ी दूं?

 

एक साधारण कागज़ पर अपनी अर्ज़ी बनाएं

और इसे पीआईओ के पास स्वयं या डाक

द्वारा जमा करें. (अपनी अर्ज़ी की एक

प्रति अपने पास निजी सन्दर्भ के लिए

अवश्य रखें)

 

१५.मैं अपनी अर्ज़ी की फीस कैसे दे सकता हूँ?

 

प्रत्येक राज्य का अर्ज़ी फीस जमा करने

का अलग तरीका है. साधारणतया, आप

अपनी अर्ज़ी की फीस ऐसे दे सकते हैं:

स्वयं नकद भुगतान

द्वारा (अपनी रसीद लेना न भूलें)

डाक द्वारा:

डिमांड ड्राफ्ट सेभारतीय पोस्टल आर्डर

सेमनी आर्डर से [केवल कुछ राज्यों में]कोर्ट

फीस टिकट से [केवल कुछ राज्यों में]बैंकर चैक

से

कुछ राज्य सरकारों ने कुछ खाते

निर्धारित किये हैं. आपको अपनी फीस

इन खातों में जमा करानी होती है.

इसके लिए, आप एसबीआई

की किसी शाखा में जा सकते हैं और

राशि उस खाते में जमा करा सकते हैं और

जमा रसीद अपनी आरटीआई अर्ज़ी के

साथ लगा सकते हैं. या आप

अपनी आरटीआई अर्ज़ी के साथ उस

विभाग के पक्ष में देय डीडी या एक

पोस्टल आर्डर भी लगा सकते हैं.

१६.क्या मैं अपनी अर्जी केवल पीआईओ के पास

ही जमा कर सकता हूँ?

नहीं, पीआईओ के उपलब्ध न होने

की स्थिति में आप अपनी अर्जी एपीआईओ

या अन्य किसी अर्जी लेने के लिए नियुक्त

अधिकारी के पास अर्जी जमा कर सकते हैं.

 

१७. क्या करूँ यदि मैं अपने पीआईओ या एपीआईओ

का पता न लगा पाऊँ?

 

यदि आपको पीआईओ या एपीआईओ

का पता लगाने में कठिनाई होती है तो आप

अपनी अर्जी पीआईओ c/o विभागाध्यक्ष

को प्रेषित कर उस सम्बंधित जन

प्राधिकरण को भेज सकते हैं. विभागाध्यक्ष

को वह अर्जी सम्बंधित पीआईओ के पास

भेजनी होगी.

१८.क्या मुझे अर्जी देने स्वयं जाना होगा?

आपके राज्य के फीस जमा करने के

नियमानुसार आप अपनी अर्जी सम्बंधित

राज्य के विभाग में अर्जी के साथ डीडी,

मनी आर्डर, पोस्टल आर्डर या कोर्ट फीस

टिकट संलग्न करके डाक द्वारा भेज सकते हैं.

केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629

डाकघरों को एपीआईओ बनाया गया है.

अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में

जाकर आरटीआई पटल पर अपनी अर्जी व

फीस जमा करा सकते हैं. वे आपको एक रसीद

व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर

का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित

पीआईओ के पास भेजे.

 

१९.क्या सूचना प्राप्ति की कोई समय

सीमा है?

हाँ, यदि आपने अपनी अर्जी पीआईओ

को दी है, आपको 30 दिनों के भीतर

सूचना मिल जानी चाहिए. यदि आपने

अपनी अर्जी सहायक पीआईओ को दी है

तो सूचना 35 दिनों के भीतर

दी जानी चाहिए. उन मामलों में

जहाँ सूचना किसी एकल के जीवन और

स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो,

सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध

हो जानी चाहिए.

 

२०.क्या मुझे कारण बताना होगा कि मुझे

फलां सूचना क्यों चाहिए?

बिलकुल नहीं, आपको कोई कारण या अन्य

सूचना केवल अपने संपर्क विवरण (जो हैं

नाम, पता, फोन न.) के अतिरिक्त देने

की आवश्यकता नहीं है. अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से संपर्क

विवरण के अतिरिक्त कुछ

नहीं पूछा जायेगा.

 

२१.क्या पीआईओ मेरी आरटीआई अर्जी लेने से

मना कर सकता है?

नहीं, पीआईओ आपकी आरटीआई अर्जी लेने से

किसी भी परिस्थिति में मना नहीं कर

सकता. चाहें वह सूचना उसके विभाग/

कार्यक्षेत्र में न आती हो, उसे वह स्वीकार

करनी होगी. यदि अर्जी उस पीआईओ से

सम्बंधित न हो, उसे वह उपयुक्त पीआईओ के

पास 5 दिनों के भीतर अनुच्छेद 6(2) के

तहत भेजनी होगी.

इस देश में कई अच्छे कानून हैं लेकिन उनमें से

कोई कानून कुछ नहीं कर सका. आप कैसे

सोचते हैं कि ये कानून करेगा?

यह कानून पहले ही कर रहा है.

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि स्वतंत्र भारत

के इतिहास में पहली बार कोई कानून

किसी अधिकारी की अकर्मण्यता के

प्रति जवाबदेही निर्धारित करता है.

यदि सम्बंधित अधिकारी समय पर

सूचना उपलब्ध नहीं कराता है, उस पर

250

रु. प्रतिदिन के हिसाब से

सूचना आयुक्त

द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है.

यदि दी गयी सूचना गलत है तो अधिकतम

25000

रु. तक

का जुर्माना लगाया जा सकता है.

जुर्माना आपकी अर्जी गलत कारणों से

नकारने या गलत सूचना देने पर

भी लगाया जा सकता है. यह जुर्माना उस

अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है.

२२. क्या अब तक कोई जुर्माना लगाया गया है?

हाँ, कुछ अधिकारियों पर केन्द्रीय व

राज्यीय

सूचना आयुक्तों द्वारा जुर्माना लगाया गया है.

क्या पीआईओ पर लगे जुर्माने

की राशि प्रार्थी को दी जाती है?

नहीं, जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में

जमा हो जाती है. हांलांकि अनुच्छेद 19 के

तहत, प्रार्थी मुआवजा मांग सकता है.

२३. मैं क्या कर सकता हूँ यदि मुझे सूचना न

मिले?

यदि आपको सूचना न मिले या आप प्राप्त

सूचना से संतुष्ट न हों, आप अपीलीय

अधिकारी के पास सूचना का अधिकार

अधिनियम के अनुच्छेद 19(1) के तहत एक

अपील दायर कर सकते हैं.

२४.पहला अपीलीय अधिकारी कौन होता है?

प्रत्येक जन प्राधिकरण को एक

पहला अपीलीय

अधिकारी बनाना होता है. यह

बनाया गया अधिकारी पीआईओ से वरिष्ठ

रैंक का होता है.

२४.क्या प्रथम अपील का कोई प्रारूप

होता है?

नहीं, प्रथम अपील का कोई प्रारूप

नहीं होता (लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने

प्रारूप जारी किये हैं). एक सादा पन्ने पर

प्रथम अपीली अधिकारी को संबोधित

करते हुए अपनी अपीली अर्जी बनाएं. इस

अर्जी के साथ अपनी मूल अर्जी व पीआईओ से

प्राप्त जैसे भी उत्तर (यदि प्राप्त हुआ

हो) की प्रतियाँ लगाना न भूलें.

२५.क्या मुझे प्रथम अपील की कोई फीस

देनी होगी?

नहीं, आपको प्रथम अपील की कोई फीस

नहीं देनी होगी, कुछ राज्य सरकारों ने

फीस का प्रावधान किया है.

 

२६.कितने दिनों में मैं अपनी प्रथम अपील

दायर कर सकता हूँ?

आप अपनी प्रथम अपील सूचना प्राप्ति के

30

दिनों व आरटीआई अर्जी दाखिल करने

के 60 दिनों के भीतर दायर कर सकते हैं.

 

२७.क्या करें यदि प्रथम अपीली प्रक्रिया के

बाद मुझे सूचना न मिले?

यदि आपको प्रथम अपील के बाद

भी सूचना न मिले तो आप द्वितीय

अपीली चरण तक अपना मामला ले जा सकते

हैं. आप प्रथम अपील सूचना मिलने के 30

दिनों के भीतर व आरटीआई अर्जी के 60

दिनों के भीतर (यदि कोई सूचना न

मिली हो) दायर कर सकते हैं.

२८.द्वितीय अपील क्या है?

द्वितीय अपील आरटीआई अधिनियम के

तहत सूचना प्राप्त करने का अंतिम विकल्प

है. आप द्वितीय अपील सूचना आयोग के पास

दायर कर सकते हैं. केंद्र सरकार के

विभागों के विरुद्ध आपके पास केद्रीय

सूचना आयोग है. प्रत्येक राज्य सरकार के

लिए, राज्य सूचना आयोग हैं.

२९.क्या द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप

है?

 

नहीं, द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप

नहीं है (लेकिन राज्य सरकारों ने द्वितीय

अपील के लिए भी प्रारूप निर्धारित किए

हैं). एक सादा पन्ने पर केद्रीय या राज्य

सूचना आयोग को संबोधित करते हुए

अपनी अपीली अर्जी बनाएं. द्वितीय

अपील दायर करने से पूर्व अपीली नियम

ध्यानपूर्वक पढ लें. आपकी द्वितीय अपील

निरस्त की जा सकती है यदि वह

अपीली नियमों को पूरा नहीं करती है.

 

३०.क्या मुझे द्वितीय अपील के लिए फीस

देनी होगी?

 

नहीं, आपको द्वितीय अपील के लिए कोई

फीस नहीं देनी होगी. हांलांकि कुछ

राज्यों ने इसके लिए फीस निर्धारित

की है.

३१.मैं कितने दिनों में द्वितीय अपील दायर

कर सकता हूँ?

आप प्रथम अपील के निष्पादन के 90

दिनों के भीतर या उस तारीख के 90

दिनों के भीतर कि जब तक आपकी प्रथम

अपील निष्पादित होनी थी, द्वितीय

अपील दायर कर सकते हैं.

३२.यह कानून कैसे मेरे कार्य पूरे होने में

मेरी सहायता करता है?

यह कानून कैसे रुके हुए कार्य पूरे होने में

सहायता करता है अर्थात् वह

अधिकारी क्यों अब वह आपका रुका कार्य

करता है जो वह पहले नहीं कर रहा था?

एक उदाहरण

आइए नन्नू का मामला लेते हैं. उसे राशन

कार्ड नहीं दिया जा रहा था. लेकिन जब

उसने आरटीआई के तहत अर्जी दी, उसे एक

सप्ताह के भीतर राशन कार्ड दे

दिया गया. नन्नू ने क्या पूछा? उसने निम्न

प्रश्न पूछे:

1. मैंने एक डुप्लीकेट राशन कार्ड के लिए

27

फरवरी 2004 को अर्जी दी.

कृपया मुझे मेरी अर्जी पर हुई दैनिक

उन्नति बताएं अर्थात् मेरी अर्जी किस

अधिकारी पर कब पहुंची, उस

अधिकारी पर यह कितने समय रही और

उसने उतने समय क्या किया?

2. नियमों के अनुसार, मेरा कार्ड 10

दिनों के भीतर बन जाना चाहिए था.

हांलांकि अब तीन माह से अधिक का समय

हो गया है. कृपया उन अधिकारियों के नाम

व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है कि वे

मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व जिन्होंने

ऐसा नहीं किया?

3. इन अधिकारियों के विरुद्ध

अपना कार्य न करने व जनता के शोषण के

लिए क्या कार्रवाई की जायेगी? वह

कार्रवाई कब तक की जायेगी?

4. अब मुझे कब तक अपना कार्ड मिल

जायेगा?

साधारण परिस्थितियों में, ऐसी एक

अर्जी कूड़ेदान में फेंक दी जाती. लेकिन यह

कानून कहता है कि सरकार को 30 दिनों में

जवाब देना होगा. यदि वे ऐसा नहीं करते

हैं, उनके वेतन में कटौती की जा सकती है. अब

ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना आसान

नहीं होगा.

पहला प्रश्न है- कृपया मुझे मेरी अर्जी पर

हुई दैनिक उन्नति बताएं.

कोई उन्नति हुई ही नहीं है. लेकिन

सरकारी अधिकारी यह इन शब्दों में लिख

ही नहीं सकते कि उन्होंने कई महीनों से

कोई कार्रवाई नहीं की है. वरन यह कागज़

पर गलती स्वीकारने जैसा होगा.

अगला प्रश्न है- कृपया उन अधिकारियों के

नाम व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है

कि वे मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व

जिन्होंने ऐसा नहीं किया.

यदि सरकार उन अधिकारियों के नाम व

पद बताती है, उनका उत्तरदायित्व

निर्धारित हो जाता है. एक

अधिकारी अपने विरुद्ध इस प्रकार कोई

उत्तरदायित्व निर्धारित होने के

प्रति काफी सतर्क होता है. इस प्रकार,

जब कोई इस तरह अपनी अर्जी देता है,

उसका रुका कार्य संपन्न हो जाता है.

मुझे सूचना प्राप्ति के पश्चात्

क्या करना चाहिए?

इसके लिए कोई एक उत्तर नहीं है. यह आप

पर निर्भर करता है कि आपने वह

सूचना क्यों मांगी व यह किस प्रकार

की सूचना है. प्राय: सूचना पूछने भर से

ही कई वस्तुएं रास्ते में आने लगतीं हैं.

उदाहरण के लिए, केवल

अपनी अर्जी की स्थिति पूछने भर से

आपको अपना पासपोर्ट या राशन कार्ड

मिल जाता है. कई मामलों में,

सड़कों की मरम्मत हो जाती है जैसे

ही पिछली कुछ मरम्मतों पर खर्च हुई

राशि के बारे में पूछा जाता है. इस तरह,

सरकार से सूचना मांगना व प्रश्न

पूछना एक महत्वपूर्ण चरण है, जो अपने आप

में कई मामलों में पूर्ण है.

लेकिन मानिये यदि आपने आरटीआई से

किसी भ्रष्टाचार या गलत कार्य

का पर्दाफ़ाश किया है, आप

सतर्कता एजेंसियों, सीबीआई को शिकायत

कर सकते हैं या एफ़आईआर भी करा सकते हैं.

लेकिन देखा गया है कि सरकार दोषी के

विरुद्ध बारम्बार शिकायतों के बावजूद

भी कोई कार्रवाई नहीं करती.

यद्यपि कोई भी सतर्कता एजेंसियों पर

शिकायत की स्थिति आरटीआई के तहत

पूछकर दवाब अवश्य बना सकता है.

हांलांकि गलत कार्यों का पर्दाफाश

मीडिया के जरिए भी किया जा सकता है.

हांलांकि दोषियों को दंड देने का अनुभव

अधिक उत्साहजनक है. लेकिन एक बात

पक्की है कि इस प्रकार सूचनाएं

मांगना और गलत कामों का पर्दाफाश

करना भविष्य को संवारता है.

अधिकारियों को स्पष्ट सन्देश मिलता है

कि उस क्षेत्र के लोग अधिक सावधान

हो गए हैं और भविष्य में इस प्रकार

की कोई गलती पूर्व

की भांति छुपी नहीं रहेगी. इसलिए उनके

पकडे जाने का जोखिम बढ जाता है.

क्या लोगों को निशाना बनाया गया है

जिन्होंने आरटीआई का प्रयोग किया व

भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया?

हाँ, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिनमें

लोगों को शारीरिक हानि पहुंचाई

गयी जब उन्होंने भ्रष्टाचार का बड़े पैमाने

पर पर्दाफाश किया. लेकिन इसका यह

अर्थ नहीं है

कि प्रार्थी को हमेशा ऐसा भय

झेलना होगा. अपनी शिकायत

की स्थिति या अन्य

समरूपी मामलों की जानकारी लेने के लिए

अर्जी लगाने का अर्थ प्रतिकार

निमंत्रित करना नहीं है.

ऐसा तभी होता है जब सूचना नौकरशाह-

ठेकेदार गठजोड़ या किसी प्रकार के

माफ़िया का पर्दाफाश कर

सकती हो कि प्रतिकार

की सम्भावना हो.

तब मैं आरटीआई का प्रयोग क्यों करुँ?

पूरा तंत्र इतना सड- गल चुका है

कि यदि हम सभी अकेले या मिलकर

अपना प्रयत्न नहीं करेंगे, यह

कभी नहीं सुधरेगा. यदि हम ऐसा नहीं करेंगे,

तो कौन करेगा? हमें करना है. लेकिन हमें

ऐसा रणनीति से व जोखिम को कम करके

करना होगा. व अनुभव से, कुछ रणनीतियां व

सुरक्षाएं उपलब्ध हैं.

ये रणनीतियां क्या हैं?

कृपया आगे बढें और किसी भी मुद्दे के लिए

आरटीआई अर्जी दाखिल करें. साधारणतया,

कोई आपके ऊपर एकदम हमला नहीं करेगा.

पहले वे आपकी खुशामद करेंगे

या आपको जीतेंगे. तो आप जैसे ही कोई

असुविधाजनक अर्जी दाखिल करते हैं, कोई

आपके पास बड़ी विनम्रता के साथ उस

अर्जी को वापिस लेने की विनती करने

आएगा. आपको उस व्यक्ति की गंभीरता और

स्थिति का अंदाजा लगा लेना चाहिए.

यदि आप इसे काफी गंभीर मानते हैं, अपने

15

मित्रों को भी तुंरत उसी जन

प्राधिकरण में उसी सुचना के लिए

अर्जी देने के लिए कहें. बेहतर होगा यदि ये

15

मित्र भारत के विभिन्न भागों से हों.

अब, आपके देश भर के 15

मित्रों को डराना किसी के लिए

भी मुश्किल होगा. यदि वे 15 में से

किसी एक को भी डराते हैं, तो और लोगों से

भी अर्जियां दाखिल कराएं. आपके मित्र

भारत के अन्य हिस्सों से अर्जियां डाक से

भेज सकते हैं. इसे मीडिया में व्यापक प्रचार

दिलाने की कोशिश करें. इससे यह

सुनिश्चित होगा कि आपको वांछित

जानकारी मिलेगी व आप जोखिमों को कम

कर सकेंगे.

क्या लोग जन सेवकों का भयादोहन

नहीं करेंगे?

आईए हम स्वयं से पूछें- आरटीआई

क्या करता है? यह केवल जनता में सच लेकर

आता है. यह कोई सूचना उत्पन्न नहीं करता.

यह केवल परदे हटाता है व सच जनता के

सामने लाता है. क्या वह गलत है?

इसका दुरूपयोग कब किया जा सकता है?

केवल यदि किसी अधिकारी ने कुछ गलत

किया हो और यदि यह सूचना जनता में

बाहर आ जाये. क्या यह गलत है

यदि सरकार में की जाने

वाली गलतियाँ जनता में आ जाएं व

कागजों में छिपाने की बजाय

इनका पर्दाफाश हो सके. हाँ, एक बार

ऐसी सूचना किसी को मिल जाए तो वह

जा सकता है व अधिकारी को ब्लैकमेल कर

सकता है. लेकिन हम गलत

अधिकारियों को क्यों बचाना चाहते है?

यदि किसी अन्य को ब्लैकमेल

किया जाता है, उसके पास भारतीय दंड

संहिता के तहत ब्लैकमेलर के विरुद्ध

एफ़आईआर दर्ज करने के विकल्प मौजूद हैं. उस

अधिकारी को वह करने दीजिये.

हांलांकि हम

किसी अधिकारी को किसी ब्लैकमेलर

द्वारा ब्लैकमेल किये जाने की संभावनाओं

को सभी मांगी गयी सूचनाओं को वेबसाइट

पर डालकर कम कर सकते हैं. एक ब्लैकमेलर

किसी अधिकारी को तभी ब्लैकमेल कर

पायेगा जब केवल वही उस सूचना को ले

पायेगा व उसे सार्वजनिक करने

की धमकी देगा. लेकिन यदि उसके

द्वारा मांगी गयी सूचना वेबसाइट पर

डाल दी जाये तो ब्लैकमेल करने

की सम्भावना कम हो जाती है.

क्या सरकार के पास आरटीआई

अर्जियों की बाढ नहीं आ जायेगी और यह

सरकारी तंत्र को जाम नहीं कर देगी?

ये डर काल्पनिक हैं. 65 से अधिक देशों में

आरटीआई कानून हैं. संसद में पारित किए

जाने से पूर्व भारत में भी 9 राज्यों में

आरटीआई कानून थे. इन में से किसी सरकार

में आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आई. ऐसे

डर इस कल्पना से बनते हैं कि लोगों के पास

करने को कुछ नहीं है व वे बिलकुल खाली हैं.

आरटीआई अर्ज़ी डालने व ध्यान रखने में

समय लगता है, मेहनत व संसाधन लगते हैं.

आईये कुछ आंकडे लें. दिल्ली में, 60 से अधिक

महीनों में 120 विभागों में 14000

अर्जियां दाखिल हुईं. इसका अर्थ हुआ कि 2

से कम अर्जियां प्रति विभाग प्रति माह.

क्या हम कह सकते हैं कि दिल्ली सरकार में

आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आ गई?

तेज रोशनी में, यूएस सरकार को 2003- 04

के दौरान आरटीआई अधिनियम के तहत 3.2

मिलियन अर्जियां प्राप्त हुईं. यह उस

तथ्य के बावजूद है कि भारत से उलट, यूएस

सरकार की अधिकतर सूचनाएं नेट पर

उपलब्ध हैं और लोगों को अर्जियां दाखिल

करने की कम आवश्यकता होनी चाहिए.

लेकिन यूएस सरकार आरटीआई अधिनियम

को समाप्त करने का विचार नहीं कर रही.

इसके उलट वे अधिकाधिक संसाधनों को इसे

लागू करने में जुटा रहे हैं. इसी वर्ष, उन्होंने

32

मिलियन यूएस डॉलर इसके

क्रियान्वयन में खर्च किये.

क्या आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन

में अत्यधिक संसाधन खर्च नहीं होंगे?

आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन में

खर्च किये गए संसाधन सही खर्च होंगे. यूएस

जैसे अधिकांश देशों ने यह पाया है व वे

अपनी सरकारों को पारदर्शी बनाने पर

अत्यधिक संसाधन खर्च कर रहे हैं. पहला,

आरटीआई पर खर्च लागत उसी वर्ष

पुनः उस धन से प्राप्त हो जाती है

जो सरकार भ्रष्टाचार व गलत कार्यों में

कमी से बचा लेती है. उदहारण के लिए, इस

बात के ठोस प्रमाण हैं कि कैसे आरटीआई के

वृहद् प्रयोग से राजस्थान के सूखा राहत

कार्यक्रम और दिल्ली की जन वितरण

प्रणाली की अनियमितताएं कम हो पायीं.

दूसरा, आरटीआई लोकतंत्र के लिए बहुत

जरुरी है. यह हमारे मौलिक

अधिकारों का एक हिस्सा है.

जनता की सरकार में भागीदारी से पहले

जरुरी है कि वे पहले जानें

कि क्या हो रहा है. इसलिए, जिस प्रकार

हम संसद के चलने पर होने वाले खर्च

को आवश्यक मानते हैं, आरटीआई पर होने

वाले खर्च को भी जरुरी माना जाये.

लेकिन प्राय

लोग निजी मामले सुलझाने के लिए

अर्जियां देते हैं?

जैसा कि ऊपर दिया गया है, यह केवल

जनता में सच लेकर आता है. यह कोई

सूचना उत्पन्न नहीं करता. सच छुपाने

या उस पर पर्दा डालने का कोई प्रयास

समाज के उत्तम हित में नहीं हो सकता.

किसी लाभदायक उद्देश्य की प्राप्ति से

अधिक,

गोपनीयता को बढावा देना भ्रष्टाचार

और गलत कामों को बढावा देगा. इसलिए,

हमारे सभी प्रयास सरकार

को पूर्णतः पारदर्शी बनाने के होने

चाहिए. हांलांकि, यदि कोई किसी को आगे

ब्लैकमेल करता है, कानून में इससे निपटने के

प्रचुर प्रावधान हैं. दूसरा, आरटीआई

अधिनियम के अनुच्छेद 8 के तहत कई बचाव

भी हैं. यह कहता है, कि कोई

सूचना जो किसी के निजी मामलों से

सम्बंधित है व इसका जनहित से कोई लेना-

देना नहीं है को प्रकट नहीं किया जायेगा.

इसलिए, मौजूदा कानूनों में लोगों के

वास्तविक उद्देश्यों से निपटने के पर्याप्त

प्रावधान हैं.

लोगों को ओछी/ तुच्छ अर्जियां दाखिल

करने से कैसे बचाया जाए?

कोई अर्ज़ी ओछी/ तुच्छ नहीं होती. ओछा/

तुच्छ क्या है? मेरा पानी का रुका हुआ

कनेक्शन मेरे लिए सबसे संकटपूर्ण

हो सकता है, लेकिन एक नौकरशाह के लिए

यह ओछा/ तुच्छ हो सकता है. नौकरशाही में

निहित कुछ स्वार्थों ने इस ओछी/ तुच्छ

अर्जियों के दलदल को बढाया है. वर्तमान

में, आरटीआई अधिनियम

किसी भी अर्ज़ी को इस आधार पर निरस्त

करने की इजाज़त नहीं देता कि वो ओछी/

तुच्छ थी. यदि ऐसा हो, प्रत्येक पीआईओ हर

दूसरी अर्ज़ी को ओछी/ तुच्छ बताकर

निरस्त कर देगा. यह आरटीआई के लिए मृत

समाधि के समान होगा.

फाइल टिप्पणियां सार्वजनिक

नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह

ईमानदार अधिकारियों को ईमानदार

सलाह देने से रोकेगा?

यह गलत है. इसके उलट, हर

अधिकारी को अब यह

पता होगा कि जो कुछ भी वो लिखता है

वह जन- समीक्षा का विषय हो सकता है.

यह उस पर उत्तम जनहित में लिखने

का दवाब बनाएगा. कुछ ईमानदार

नौकरशाहों ने अलग से स्वीकारा है

कि आरटीआई ने उनकी राजनीतिक व अन्य

प्रभावों को दरकिनार करने में बहुत

सहायता की है. अब अधिकारी सीधे तौर

पर कहते हैं कि यदि उन्होंने कुछ गलत

किया तो उनका पर्दाफाश

हो जायेगा यदि किसी ने उसी सूचना के

बारे में पूछ लिया. इसलिए, अधिकारियों ने

इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया है

कि वरिष्ठ अधिकारी लिखित में निर्देश

दें. सरकार ने भी इस पर मनन

करना प्रारंभ कर दिया है कि फाइल

टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम

की सीमा से हटा दी जाएँ. उपरोक्त

कारणों से, यह नितांत आवश्यक है कि फाइल

टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम

की सीमा में रहें.

जन सेवक को निर्णय कई दवाबों में लेने होते

हैं व जनता इसे नहीं समझेगी?

जैसा ऊपर बताया गया है, इसके उलट, इससे

कई अवैध दवाबों को कम

किया जा सकता है.

सरकारी रेकॉर्ड्स सही आकार में नहीं हैं.

आरटीआई को कैसे लागू किया जाए?

आरटीआई तंत्र को अब रेकॉर्ड्स सही आकार

में रखने का दवाब डालेगा. वरन

अधिकारी को अधिनियम के तहत दंड

भुगतना होगा.

विशाल जानकारी मांगने

वाली अर्जियां रद्द कर देनी चाहिए?

यदि मैं कुछ जानकारी चाहता हूँ, जो एक

लाख पृष्ठों में आती है, मैं

ऐसा तभी करूँगा जब मुझे

इसकी आवश्यकता होगी क्योंकि मुझे उसके

लिए 2 लाख रुपयों का भुगतान

करना होगा. यह एक स्वतः ही हतोत्साह

करने वाला उपाय है. यदि अर्ज़ी इस आधार

पर रद्द कर दी गयी, तो प्रार्थी इसे

तोड़कर प्रत्येक अर्ज़ी में 100 पृष्ठ मांगते

हुए 1000 अर्जियां बना लेगा, जिससे

किसी का भी लाभ नहीं होगा. इसलिए, इस

कारण अर्जियां रद्द नहीं होनी चाहिए

कि:

"लोगों को केवल अपने बारे में सूचना मांगने

दी जानी चाहिए. उन्हें सरकार के अन्य

मामलों के बारे में प्रश्न पूछने की छूट

नहीं दी जानी चाहिए", पूर्णतः इससे

असंबंधित है:

आरटीआई अधिनियम का अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से यह

नहीं पूछा जा सकता कि क्यों वह कोई

जानकारी मांग रहा है. किसी भी मामले में,

आरटीआई इस तथ्य से उद्धृत होता है

कि लोग टैक्स/ कर देते हैं, यह उनका पैसा है

और इसीलिए उन्हें यह जानने का अधिकार

है कि उनका पैसा कैसे खर्च हो रहा है व कैसे

उनकी सरकार चल रही है. इसलिए

लोगों को सरकार के प्रत्येक कार्य

की प्रत्येक बात जानने का अधिकार है. वे

उस मामले से सीधे तौर पर जुड़े हों या न

हों. इसलिए, दिल्ली में रहने

वाला व्यक्ति कोई भी सूचना मांग

सकता है चाहे वह तमिलनाडु की हो.

आरटीआई अधिनियम का अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से यह

नहीं पूछा जा सकता कि क्यों वह कोई

जानकारी मांग रहा है. किसी भी मामले में,

आरटीआई इस तथ्य से उद्धृत होता है

कि लोग टैक्स/ कर देते हैं, यह उनका पैसा है

और इसीलिए उन्हें यह जानने का अधिकार

है कि उनका पैसा कैसे खर्च हो रहा है व कैसे

उनकी सरकार चल रही है. इसलिए

लोगों को सरकार के प्रत्येक कार्य

की प्रत्येक बात जानने का अधिकार है. वेउस मामले से सीधे तौर पर जुड़े हों या न

हों. इसलिए, दिल्ली में रहने

वाला व्यक्ति कोई भी सूचना मांग

सकता है चाहे वह तमिलनाडु की हो.

Sunday, 13 November 2011

वृक्ष लगाओ, पर्यावरण बचाओ

एक आदमी एक दिन में इतना ऑक्सीजन
लेता है जितने में 3 ऑक्सीजन के सिलेंडर भरे
जा सकते हैं | एक ऑक्सीजन सिलेंडर
की कीमत होती है रु.700 इस तरह हम
देखते हैं कि एक आदमी एक दिन में रु.2100
(700X3) की ऑक्सीजन लेता है और 1 साल
में रु.766500 कि और अपने पूरे जीवन (अगर
आदमी कि उम्र 65 साल हो) में लगभग रु.
5 करोड़ का ऑक्सीजन लेता है जो कि पेड़-
पौधों द्वारा हमे फ्री में मिलता है और हम
उन्ही पेड़ पौधों को समाप्त कर रहे है |

आंख भर चितराम

*पाठकीय दृष्टि*

*कविताओं के मुंह बोलते चितराम*


'आंख भर चितराम' वरिष्ठ कवि ओम
पुरोहित 'कागद'
की राजस्थानी कविताओं का ताजा
संग्रह है जिसमें कवि ने वर्णन व विवरण से
आगे बढकर कविता को नूतन भाव-भूमि
सौंपी है । इन कविताओं की विषय-वस्तु
हमारे आस-पास के परिवेश की है मगर
कविताओं की बुणगट कवि की सूक्ष्म व
पैनी दृष्टि का परिचय देती है । शब्दों से
चाक्षुष बिम्बों की मार्फत दृश्य के रूप में
उतरती इन कविताओं में राजस्थानी
कविता के बदलते मिजाज को रेखांकित
किया जा सकता है । कवि की कल्पना व
मौलिक
दृष्टि से ये शब्द चित्र पाठक
को मन्त्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं ।
आठ खंडो में बंटे इस कविता संग्रह में
प्रकृति के साथ कवि का घरोपा स्पष्ठ
रूप
से देखा जा सकता है । संग्रह की थार,
बादळ, अडवो, खेजडी, एवं काळीबंगा
श्रृंखला की कविताओं में
राजस्थानी धरा की विविधरूपा अभिव्यक्ति हुई
है । इन
कविताओं में कहीं चिड़िया अड़वे की बाजू
में घुसने-निकलने का खेल खेलती नजर आती
है तो कहीं उजाड मरुस्थल में बिना लूंग
खडी बूढी खेजडी हाथों में रावणहत्था
लिये कलावती जैसी लगती है । इन
चित्रों में कहीं हरियल
खेजडी की चूंद्डी में
चन्द्रमा 'त्या' करता है
तो कहीं पक्षी अडवे की बाजू-जेब में अंडे
देते हैं ।
यहां कवि थार को विधना की 'सोनळ-
सेज' के रूप में चित्रित करता है तो मरूधर
की
रेत उसे पानी व बादलों की तलाश में
भटकती मिलती है ।
खेजडी को 'लूंठी सराय'
बताता हुआ कवि पूछ्ता है- "बसै कठै/
कीडी-कांटा/मोर-पखेरू/छोड
खेजडी।" (पृ. ३५)
राजस्थानी लोक जीवन का इतना सहज-
स्वाभाविक रूप इन कविताओं में प्रकट हुआ
है कि
पाठकीय चेतना मरूभौम की महक से
आप्लावित हो जाती है । 'कागद'
की कविताओं में
'लोक' महज नॊस्टेल्जिया की नहीं,
बल्कि रचाव की भूमि के रूप में आया है।
इन
कविताओं में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान
बोलता-बतियाता है।
मरूधरा का भौगोलिक
परिवेश, सांस्कृतिक परम्पराएं, अकाल,
आदि प्राकृतिक आपदाएं, जीवन संघर्ष इन
कविताओं में सहज रूप से उजागर हुआ है।
'काळीबंगा' शीर्षक खंड की इक्कीस
कविताओं की लड़ी इस किताब को खास
बना देती है।
हनुमानगढ जिले के काळीबंगा गांव में तीन
हजार वर्षों से भी अधिक पुरानी सभ्यता
के अवशेषों का अवलोकन
करती कवि की दृष्टि इन कविताओं में एक
भरी-पूरी दुनिया
के उजड़ने की त्रासदी को सामुदायिक
नजरिए से देखती है। 'काळीबंगा रो
मून/बतावै/एक जात/आदमजात/
जकी भेळी जागी/भेळी ही सोई/भेळप
निभाई/ढिगळी होवण
तांई।'(पृ. ७१)
कवि कालीबंगा के थेहड़ में जीवन के
चिन्हों की पड़ताल करते हुए स्वर्णिम
अतीत से
मिट्टी में मिलने की करूण
यात्रा को प्रत्यक्ष कर देता है।
मानवीय दृष्टि से
इस तरह इतिहास की जनपक्षीय पड़ताल
राजस्थानी कविता में पहली बार पढने
को मिली
है।
प्रकृति के विभिन्न रंगो से साक्षात
करवाती इस काव्यकृति की झूठ और मन
खंड की
कविताओं का स्वर अन्य रचनाओं से किंचित
अलहदा लगता है वहीं नवीन जैन की
फोटोग्राफी देखकर रचित 'जातरा'
सीरीज की कविताओं में पाठक
को उनकी प्रेरक फोटो
की कमी अखरती है।
यद्यपि कम से कम शब्दों में बात कहने
का हुनर व लय पर कवि की पकड़ से इन
कविताओं का शिल्प सशक्त नजर आता है।
ये चितराम पाठक को न केवल एक एलबम
देखने
के आनंद का अहसास करवाते हैं
बल्कि इनकी गूंज उसके मन-मस्तिष्क
को चिन्तन-मनन
के लिये भी प्रेरित करती है।
राजस्थानी कविता के नए तेवर से रूबरू
होने के
लिये इस संग्रह का तन्मयतापूर्ण पाठ
जरूरी है।
*
-मदन गोपाल लढ़ा*