*कविताओं के मुंह बोलते चितराम*
'आंख भर चितराम' वरिष्ठ कवि ओम
पुरोहित 'कागद'
की राजस्थानी कविताओं का ताजा
संग्रह है जिसमें कवि ने वर्णन व विवरण से
आगे बढकर कविता को नूतन भाव-भूमि
सौंपी है । इन कविताओं की विषय-वस्तु
हमारे आस-पास के परिवेश की है मगर
कविताओं की बुणगट कवि की सूक्ष्म व
पैनी दृष्टि का परिचय देती है । शब्दों से
चाक्षुष बिम्बों की मार्फत दृश्य के रूप में
उतरती इन कविताओं में राजस्थानी
कविता के बदलते मिजाज को रेखांकित
किया जा सकता है । कवि की कल्पना व
मौलिक
दृष्टि से ये शब्द चित्र पाठक
को मन्त्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं ।
आठ खंडो में बंटे इस कविता संग्रह में
प्रकृति के साथ कवि का घरोपा स्पष्ठ
रूप
से देखा जा सकता है । संग्रह की थार,
बादळ, अडवो, खेजडी, एवं काळीबंगा
श्रृंखला की कविताओं में
राजस्थानी धरा की विविधरूपा अभिव्यक्ति हुई
है । इन
कविताओं में कहीं चिड़िया अड़वे की बाजू
में घुसने-निकलने का खेल खेलती नजर आती
है तो कहीं उजाड मरुस्थल में बिना लूंग
खडी बूढी खेजडी हाथों में रावणहत्था
लिये कलावती जैसी लगती है । इन
चित्रों में कहीं हरियल
खेजडी की चूंद्डी में
चन्द्रमा 'त्या' करता है
तो कहीं पक्षी अडवे की बाजू-जेब में अंडे
देते हैं ।
यहां कवि थार को विधना की 'सोनळ-
सेज' के रूप में चित्रित करता है तो मरूधर
की
रेत उसे पानी व बादलों की तलाश में
भटकती मिलती है ।
खेजडी को 'लूंठी सराय'
बताता हुआ कवि पूछ्ता है- "बसै कठै/
कीडी-कांटा/मोर-पखेरू/छोड
खेजडी।" (पृ. ३५)
राजस्थानी लोक जीवन का इतना सहज-
स्वाभाविक रूप इन कविताओं में प्रकट हुआ
है कि
पाठकीय चेतना मरूभौम की महक से
आप्लावित हो जाती है । 'कागद'
की कविताओं में
'लोक' महज नॊस्टेल्जिया की नहीं,
बल्कि रचाव की भूमि के रूप में आया है।
इन
कविताओं में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान
बोलता-बतियाता है।
मरूधरा का भौगोलिक
परिवेश, सांस्कृतिक परम्पराएं, अकाल,
आदि प्राकृतिक आपदाएं, जीवन संघर्ष इन
कविताओं में सहज रूप से उजागर हुआ है।
'काळीबंगा' शीर्षक खंड की इक्कीस
कविताओं की लड़ी इस किताब को खास
बना देती है।
हनुमानगढ जिले के काळीबंगा गांव में तीन
हजार वर्षों से भी अधिक पुरानी सभ्यता
के अवशेषों का अवलोकन
करती कवि की दृष्टि इन कविताओं में एक
भरी-पूरी दुनिया
के उजड़ने की त्रासदी को सामुदायिक
नजरिए से देखती है। 'काळीबंगा रो
मून/बतावै/एक जात/आदमजात/
जकी भेळी जागी/भेळी ही सोई/भेळप
निभाई/ढिगळी होवण
तांई।'(पृ. ७१)
कवि कालीबंगा के थेहड़ में जीवन के
चिन्हों की पड़ताल करते हुए स्वर्णिम
अतीत से
मिट्टी में मिलने की करूण
यात्रा को प्रत्यक्ष कर देता है।
मानवीय दृष्टि से
इस तरह इतिहास की जनपक्षीय पड़ताल
राजस्थानी कविता में पहली बार पढने
को मिली
है।
प्रकृति के विभिन्न रंगो से साक्षात
करवाती इस काव्यकृति की झूठ और मन
खंड की
कविताओं का स्वर अन्य रचनाओं से किंचित
अलहदा लगता है वहीं नवीन जैन की
फोटोग्राफी देखकर रचित 'जातरा'
सीरीज की कविताओं में पाठक
को उनकी प्रेरक फोटो
की कमी अखरती है।
यद्यपि कम से कम शब्दों में बात कहने
का हुनर व लय पर कवि की पकड़ से इन
कविताओं का शिल्प सशक्त नजर आता है।
ये चितराम पाठक को न केवल एक एलबम
देखने
के आनंद का अहसास करवाते हैं
बल्कि इनकी गूंज उसके मन-मस्तिष्क
को चिन्तन-मनन
के लिये भी प्रेरित करती है।
राजस्थानी कविता के नए तेवर से रूबरू
होने के
लिये इस संग्रह का तन्मयतापूर्ण पाठ
जरूरी है।
*
-मदन गोपाल लढ़ा*


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