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Tuesday, 8 November 2011

स्व. नानूराम जी सँस्कर्ता

मिनखां बिगङया म्हेँदरा थिगै जिनावर
थाट।
पंछी उडै अबै-दरा, बंजङ बारा वाट॥1॥
दिन दोरा उमस-भरया काटां दुखङा देख।
'गिणतां घिसी आसाढ-नै आंगळियां री रेख'
॥2॥
कीकर-कैरां, कूमटां जङ-जाखङ, झुंडझांस।
वन बंजङ, बीहङ बळया फोगी, फोग,
फरांस॥3॥
मुरधर मंगळ रूप, जठै जंगळ भळ भारी।
दंगळ धोरा, डैर, मैर मुरङा मझधारी।
दाइया भोमी-भाग अखङ भांती-
रा सारा।
धोरा, डहरी, ताल, पाळ, परबत बेचारा।
भुरट, मुरट, धामण धरा ना,
धूंधा धोरा घास है।
खीँपा, पीँपा फोगङा मेँ ठूंठा थोथा ठांस
है॥4॥
बूठ कळायण! मुर-धरा पूरण आखी आस।
तो तूंठ्या रुङी रूतां, मोजां बारां मास॥
5॥
होसी जेठू बाजरी, वासी मोभी पूत।
खासी दुनिया दूर-री, करे कळायण कूंत॥
6॥
भोम मोम ज्यूं गळ रयी, उमस ओग अथोग।
ग्रीखम भावण रातङ्या दिवसां दाझै
लोग॥7॥
चेतो कर चित मांय हरख-सूं आव हठीली।
बिरंगी-सी बणराय बणात रंग-रंगीली।
छैके हाली आव छबीली! देती ठेका।
मोरां मन हुळसाय मगेजण! सुणज्या केका।
घुरा नगारा गैरी घुळज्या उमस
उनाळो मारणै।
जोङा झोळ झिळोळ भरणै आव कळायण!
तारणै॥8॥
जेठ महीनै जोर-री चंचळ लू चाली।
नीर लुकायो लोयणां, ज्यूं ठीकर ठाली॥
9॥
आख्यां आडो काच-सो, सूक्या आंसूङा।
बैठा झीणी झाङख्यां तिस मरता मिरगा॥
10॥
बिरखां बिलखा सूवटा, मोर कूवटां केळ।
गायां छायां-छानङया,खोल्यां उभी खेळ॥
11॥
हरया रवै ना रुँख, सूकग्या सगळा सारा।
हरी तुसर ना मिलै ओखदां-तणी तिवारां।
बाळक सैवे गोद डसाडस उमस-झाळां।
मात पळूसै माथ, पसेवो चाल्यो खाळां।
मूवा-सा बाळक हुवा है लाय लुवां-री ताप
तळ।
मांचां पर बूढा-बढैरा सिसकै तपती बीच
बळ॥12॥
उमस-ओग तन माणसां फुणसी-फोङा होय।
उधङ अळायां चमचमै, खाज खुसी री खोय॥
13॥
टाबरिया भाज्या बगै झलती ताती लाय।
बळता पांव घसोङता पोटां मेँ चिरळाय॥
14॥
छायां आयां छोकरा पग ठंडा कर लेय।
इसङी ताती धूङ-नै टाबर निकळै खेय॥15॥
घास नहीँ भर-पेट, भेङङ्या लौटे भूखी।
झट कोठा लै सोख, खेळियां कर दै सूखी।
सांडा टोडां टोळ टुळककर कूवै आया।
नीर मिलै तो मिलै, नहीँ तो रवै तिसाया।
गंडकङा गळियां फिरै है
तिसिया ताप्या तावङै।
ऐ मौजां उण दिन करैला, जिण दिन
वरसा बावङै॥16॥
झूरै जाझा जीवङा मुरधर बिन बरखा।
उझळ उनाझै ओग मेँ उण-मुण उणियारा॥17॥
आंचळ आंसू पूंछती नार्यां निरख निरख
रही।
आसी अवस उडीक पर, सजनी! समझ सही॥
18॥
बिन जळ ज्यूँ होवै कमळ, बिना चाँद ज्यूं
रात।
सूक्यो सारो सोरखै, मुरधर काळो गात॥
19॥
डांगर बांठां जाय, घरां ही रवै घणा है।
खोडां मेँ के खाय, तिणकला गिण्या-
गिण्या है।
खेजङलां री छांय भैँसङ्या नाख्यो हांगो।
पाणी-रा ऐ जीव हाल है खोटो आं-गो।
हांफतङी हूँ-हूँ करै है बण गरीब ज्यूं
गावङ्यां।
काळी मतवाळी बणैली बहन कळायण
बावङ्यां॥20॥

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