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Monday, 7 November 2011

काळी कांतळ

हरि! म्हारो हिङदै आज कळायण री गाज ले वगी।
कुण जाणै किरपा निधान, वा काळी रात कठै लेजा नाखसी?
मेघ मलार री बाजती वीणा माथै वैँ री चोट वीजळी-सी पिल पङै।
हिङदै मेँ वैँ रो अजर सरगम-वज्र ज्यूं गरजै!
टोकां री कतारां, जळद ऊमटै-उवारै घणघोर
अंधारे मनै चपेट ले लपेट्‌यो है।
मतवाळी वाय कुदङका मारै अर म्हारै संग
मेघ रंग बैवे उडती बगै ।

स्व. म. नानूराम जी सँस्कर्ता की रचना 'गीतमाळा' सूँ

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