हरि! म्हारो हिङदै आज कळायण री गाज ले वगी।
कुण जाणै किरपा निधान, वा काळी रात कठै लेजा नाखसी?
मेघ मलार री बाजती वीणा माथै वैँ री चोट वीजळी-सी पिल पङै।
हिङदै मेँ वैँ रो अजर सरगम-वज्र ज्यूं गरजै!
टोकां री कतारां, जळद ऊमटै-उवारै घणघोर
अंधारे मनै चपेट ले लपेट्यो है।
मतवाळी वाय कुदङका मारै अर म्हारै संग
मेघ रंग बैवे उडती बगै ।
स्व. म. नानूराम जी सँस्कर्ता की रचना 'गीतमाळा' सूँ

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