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Monday, 7 November 2011

मतीरो

मन ठंडो तन मोर, जन-जन जीधन सरस फळ।
मरुधर मिनख विभोर, माखण-छकण मतीरियाँ॥
वा:ला फळ बेजोङ, वागङ खेताँ वधमणा।
हरख करै कुण होङ, रसना मधुर मतीरियाँ॥
च्यारुँ रुत चौसार, ठंड ठरावै धूजणी।
भूख वैभकी मार, माङी जाण मतीरिया॥
कदै ना भूलै कोड, सीरे मनस्या, सेरणी।
हिवना हवै सरोढ, मधु सूं गरज मतीरियाँ॥
भूधर कितरो भार, जळ समदर रो तोल के?
वड मतीर मनवार, परब उमंगां ऊछबां॥
रळ रसना री राग, तन-मन माखण तरळ मछ।
जोग मतीरां जाग, मोळ भजण खण खुख खजण॥
कूंजा गिरी गुलाब, रोवां डोरां रस डबल।
अबल मतीरां आब, रतनां रळी बधावणा॥
छोल्या ओग उबाळ, मगज मतीरां री जयां।
तूम्बा रसना टाळ, मीठा बणै न ऊँट गळ॥
मैँणतियां री मौज, घर-घुसिया जाणै किसी।
खावै सुधियाँ खोज, ताँसू तोङ मतीरिया॥


स्व. गुरुदेव नानूराम जी सँस्कर्ता के काव्य 'दसदात' सूँ

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