सबद साधना रा पांच चितराम
(स्व. गुरूदेव नानूराम जी संस्कर्ता की स्मृति में)
एक
म्हैं काळू में इग्यारहवीं जमात में पढतो। ऐक दिन ऐक जळसे में गुरूजी नानूराम संस्कर्ता रो विद्यालय में आवणो हुयो। गुरूजी सागै म्हारौ परिचय हो। जळ्से पछै म्हैं गुरूजी ने बतायो क म्हारी साहित्य मांय रुचि है। म्हनैं मायड भासा री रचनावां घणी चोखी लागै। म्हैं राजस्थानी सीखणी ई चावूं। गुरूजी म्हनै आपरी पोथी ‘गांव-गिगरथ‘ पढणै खातर कैयो जिण सूं राजस्थानी सबदां रो ग्यान बंधे। आप आथण म्हनै घरै बुलायो अर पोथी देवण री हामळ भरी। म्है उणं दिन गुरूजी रै अठै जा नीं सक्यो। अगलै दिन म्हैं सिनान कर’र बाखळ में बैठ्यो अखबार बांचै हो जणा देख’र हरख हुयो क गुरूजी खुद म्हारै घरै(नानेरै) पधारया है। आप म्हनैं ‘गांव-गिगरथ‘ पोथी सूंपी अर राजस्थानी पढण-लिखण री सीख दीवी।
दो
ऐक दिन म्हैं सरस्वती पुस्तकालय में गुरूजी नैं म्हारी कविता सुणायी अर उण में सुधार री ई अरज करी। गुरूजी म्हनै अगलै दिन सबेरै आठ बजे घरै बुलायो। दिनुगै जणा म्हारी आंख खुली तो घड़ी आठ बजा राख्या। म्हैं तावळो-सी न्हायो अर सिरावण कर’र गुरूजी रै घर कांनी टुरग्यो। गुरूजी रो आठ बजे रो आवणै रो कैयोड़ो अर म्हैं पूण घण्टा देरी सूं चालै हो। घर रे बारलै मोड़ा सूं तकायो तो गुरूजी आपरै आफिस रै थळी बिचाळै बैठ्या ‘जागती जोत‘ बांचै हा। म्हैं म्हारी लिख्योड़ी कविता ‘भारत वंदना‘ आपरै आगै कर दी। गुरूजी छन्द रै मुजब कविता बांची अर जरूरी सुधार ई करया। १६-१६ मात्रावां रो छन्द हो। म्हैं गुरूजी नै बतायो क ‘लंकाण-धणी‘ रे दूजै साका नै बांच’र म्हैं आ कविता लिखी है। गुरूजी मांय-मांय ई मुळक्या अर ‘लंकाण धणी‘ री ऐ ओळ्यां गुणगुणावण लागग्या-
"राड़ जिन्दगी रो वसाव है
सुख दुख पोळ सरीरां आवै।
होड़ झोड़ दौड दौडतां
मिनखपणै रो नांव कमावै॥"
तीन
ऐक दिन ठा पड्यो के गुरूजी री तबीयत नरम है। डाकदर आराम करणै री सलाह दीवी है। म्हैं उण घड़ी ई गुरूजी सूं मिलणै खातर चाल पड्यो घरै कमरै मांय माचै माथै गुरूजी सूत्या हा। सिरांथै एक थेली मांय धोबो खण दुवायां पड़ी ही। म्हनैं देख’र हरा हुग्या- ‘आव रे लढा। केइ दिनां सूं आवणो हुयो।’ म्हैं खंनै ई पीढै माथै बैठग्यो अर तबीयत बाबत लागग्यो। पण गुरूजी नै तबीयत री फिकर कठै। दो-च्यार मिनटां में बात कविता माथै खींच लाया।
’टोळां री टोळी सी ल्यासी, सावण बीरो मेह बरसासी
सावण सुख उपजावण सब रै, मेहां रो मांझीड़ो आसी’
घर मांय म्हनैं बतायो क डाकदर आपनै अबा’र कविता लिखण पढण नै मना करयो है। इण सूं आराम में बिझोळ पड़ै। गुरूजी बोल्या- बावळो है डाकदर। कविता रै ताण ई तो जीवूं हूं। इणनै छोडण री बात ई कियां सोचीजै। अर आप भळै ’कळायण’ सूं गीत सुणावण लागग्या। म्हैं साहित्य अर आपरै सगपण बाबत सोचतो गीत सुणतो रैयो।
च्यार
कथाकार रामस्वरूप किसान रै लघु कथा संग्रह ’सपने रो सपनो’ रो विमोचन काळू में गुरूजी रे हाथां हुयो। समारोह मांय विमोचित पौथी माथै कम राजस्थानी भासा री मान्यता बाबत बेसी बात हुयी। सगळा वक्ता राजस्थानी री मान्यता खातर जन आन्दोलन री जरूरत बतायी। गुरूजी अध्क्षता करतां थकां कैयो- ‘आ बिचारजोग बात है कि राजस्थानी की मान्यता खातर राजस्थानियां सूं ई संघर्ष सारू आगै आवणै रो आह्वान करणो पडै। सुवाल फगत भासा रो नीं वजूद रो है।’ गुरूजी री ऐ ओळ्यां घिर-घिर चेते आवै ’भासा लारै छूटण सूं राजस्थानी संस्कृति री रंगत फीकी पड़ रैयी है। संस्कृति नै बचावणी है तो भासा नै बचावो नींतर राजस्थान री निजू पिछाण तकात खतम हुय जावैला।’
पांच
महाजन मांय गुरूजी रै पोतै रो व्याह हो। गुरूजी ई महाजन पधारया। घूमतां-फिरतां गुरूजी एडवोकेट राजीव सोमाणी रै घरै पधारया। बठै म्हैं, शिक्षक मूलचन्द बोहरा, भवानीशंकर शर्मा आद गुरूजी सूं कवितावां सुणावणै री अरज करी। गुरूजी कविता सुणायी ‘थे भूल रैया क्यूं भासा नै,जो मायड़ राजस्थानी है।‘ ‘दस दात‘ पोथी सूं भींग, मामोलिया, मोठ, सेवण, सांगरी, रोहिड़ा माथै सोरठा ई सुणाया। सगळा घणां राजी हुया। उण दिन गुरूजी रै पोतै रो सावो बैठणो हो। घरै सगळा गुरूजी ने अडीकै हा। कणीं आय’र गुरूजी नै कैयो जणां चेतो करयो है अर म्हाने सगळा नै लेय’र व्याह आळै घर कांनी टुरग्या।
-डॊ.मदन गोपाल लढा
१४४,लढा निवास,महाजन


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