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Sunday, 13 November 2011

जीवन चक्र

बचपन में देखा करता था
गाँव में पैसे भेजता हुआ पिता !
मजाल है कि एक भी महीना,
कभी गया हो इससे रीता !!
हर माह पहली तारीख को
बंधा हुआ एक निश्चित क्रम !
जो कभी टूट न पाया
बाबा क़े जीवन पर्यंत !
सोचा करता था,
पैंट मेरी कब से है फटी हुई
माँ करती रहती है पैबंद उसे
इन्हे तो मेरी कोई चिंता ही नहीं
बेटे से बड़ा हो गया पिता उन्हें !
आज मै भी करता रहता हूँ,
हर पहली तारीख का इंतजार !
जो इसी तरह निकल जाती है
रीती हुई बार बार !!
आज मै बड़ा नहीं हूँ,
क्यों कि मेरे बेटे को
चिंता है ज्यादा मुझसे,
मेरे अपने पोते क़ी....!

- दिनेश मिश्र

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