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Wednesday, 16 November 2011

सूचना का अधिकार क्या है?



. सूचना का अधिकार क्या है?

 

संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत

सूचना का अधिकार मौलिक

अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1)

के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व

अभिव्यक्ति का अधिकार है. 1976 में

सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण

विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में

कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर

सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण

सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है.

इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे

कहा कि भारत एक लोकतंत्र है. लोग

मालिक हैं. इसलिए लोगों को यह जानने

का अधिकार है कि सरकारें

जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं?

व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है.

यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने

वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब

वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.

(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में).

नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने

का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार

खर्च हो रहा है. इन तीन

सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने

रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक

अधिकारों का एक हिस्सा हैं.

. यदि आरटीआई एक मौलिक अधिकार है,

तो हमें यह अधिकार देने के लिए एक कानून

की आवश्यकता क्यों है?

 

 

ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि आप

किसी सरकारी विभाग में जाकर

किसी अधिकारी से कहते हैं, "आरटीआई

मेरा मौलिक अधिकार है, और मैं इस देश

का मालिक हूँ. इसलिए मुझे आप

कृपया अपनी फाइलें दिखायिए", वह

ऐसा नहीं करेगा. व संभवतः वह आपको अपने

कमरे से निकाल देगा. इसलिए हमें एक ऐसे

तंत्र या प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसके

तहत हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कर

सकें. सूचना का अधिकार 2005, जो 13

अक्टूबर 2005 को लागू हुआ हमें वह तंत्र

प्रदान करता है. इस प्रकार

सूचना का अधिकार हमें कोई नया अधिकार

नहीं देता. यह केवल उस

प्रक्रिया का उल्लेख करता है कि हम कैसे

सूचना मांगें, कहाँ से मांगे, कितना शुल्क दें

आदि.

.सूचना का अधिकार कब लागू हुआ?

 

केंद्रीय सूचना का अधिकार 12 अक्टूबर

2005

को लागू हुआ. हालांकि 9 राज्य

सरकारें पहले ही राज्य कानून पारित कर

चुकीं थीं. ये थीं: जम्मू कश्मीर, दिल्ली,

राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,

कर्नाटक, तमिलनाडु, असम और गोवा.

सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से

अधिकार आते हैं?

सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक

नागरिक को शक्ति प्रदान करता है

कि वो:

सरकार से कुछ भी पूछे या कोई

भी सूचना मांगे.

किसी भी सरकारी निर्णय

की प्रति ले.

किसी भी सरकारी दस्तावेज

का निरीक्षण करे.

किसी भी सरकारी कार्य

का निरीक्षण करे.

किसी भी सरकारी कार्य के

पदार्थों के नमूने ले.

.सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से

अधिकार आते हैं?

 

केन्द्रीय कानून जम्मू कश्मीर राज्य के

अतिरिक्त पूरे देश पर लागू होता है.

सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य

कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के

अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर

सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के

हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त-

पोषित किये जाते हों.

. "वित्त पोषित" क्या है?

इसकी परिभाषा न ही सूचना का अधिकार

कानून और न ही किसी अन्य कानून में

दी गयी है. इसलिए यह मुद्दा समय के साथ

शायद किसी न्यायालय के आदेश

द्वारा ही सुलझ जायेगा.

.क्या निजी इकाइयां सूचना के अधिकार के

अर्न्तगत आती हैं?

सभी निजी इकाइयां, जोकि सरकार की हैं,

सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त-

पोषित की जाती हैं सीधे ही इसके

अर्न्तगत आती हैं. अन्य अप्रत्यक्ष रूप से

इसके अर्न्तगत आती हैं. अर्थात, यदि कोई

सरकारी विभाग किसी निजी इकाई से

किसी अन्य कानून के तहत सूचना ले

सकता हो तो वह सूचना कोई नागरिक

सूचना के अधिकार के अर्न्तगत उस

सरकारी विभाग से ले सकता है.

 

 

.क्या सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून

1923

सूचना के अधिकार में बाधा नहीं है?

नहीं, सूचना का अधिकार अधिनियम

2005

के अनुच्छेद 22 के अनुसार

सूचना का अधिकार कानून

सभी मौजूदा कानूनों का स्थान ले लेगा.

क्या पीआईओ सूचना देने से मना कर

सकता है?

एक पीआईओ सूचना देने से मना उन 11

विषयों के लिए कर सकता है

जो सूचना का अधिकार अधिनियम के

अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें

विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय

सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक,

वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से

हानिकारक सूचना, विधायिका के

विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने

वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार

अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18

अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये

लागू नहीं होता. हालांकि उन्हें

भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार

के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से

सम्बंधित हों.

 

.क्या अधिनियम विभक्त सूचना के लिए

कहता है?

 

 

हाँ, सूचना का अधिकार अधिनियम के दसवें

अनुभाग के अंतर्गत दस्तावेज के उस भाग तक

पहुँच बनायीं जा सकती है जिनमें वे सूचनाएं

नहीं होतीं जो इस अधिनियम के तहत भेद

प्रकाशन से अलग रखी गयीं हैं.

.क्या फाइलों की टिप्पणियों तक पहुँच से

मना किया जा सकता है?

नहीं,

फाइलों की टिप्पणियां सरकारी फाइल

का अभिन्न अंग हैं व इस अधिनियम के तहत

भेद प्रकाशन की विषय वस्तु हैं.

ऐसा केंद्रीय सूचना आयोग ने 31

जनवरी 2006 के अपने एक आदेश में स्पष्ट

कर दिया है.

 

१०. मुझे सूचना कौन देगा?

 

एक या अधिक अधिकारियों को प्रत्येक

सरकारी विभाग में जन

सूचना अधिकारी (पीआईओ) का पद

दिया गया है. ये जन

सूचना अधिकारी प्रधान अधिकारियों के

रूप में कार्य करते हैं.

आपको अपनी अर्जी इनके पास दाखिल

करनी होती है. यह उनका उत्तरदायित्व

होता है कि वे उस विभाग के विभिन्न

भागों से आपके

द्वारा मांगी गयी जानकारी इकठ्ठा करें

व आपको प्रदान करें. इसके अलावा, कई

अधिकारियों को सहायक जन

सूचना अधिकारी के पद पर सेवायोजित

किया गया है. उनका कार्य केवल जनता से

अर्जियां स्वीकारना व उचित पीआईओ के

पास भेजना है.

११.अपनी अर्जी मैं कहाँ जमा करुँ?

 

आप ऐसा पीआईओ या एपीआईओ के पास कर

सकते हैं. केंद्र सरकार के विभागों के

मामलों में, 629 डाकघरों को एपीआईओ

बनाया गया है. अर्थात् आप इन डाकघरों में

से किसी एक में जाकर आरटीआई पटल पर

अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं. वे

आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और

यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है

कि वो उसे उचित पीआईओ के पास भेजे.

 

१२.क्या इसके लिए कोई फीस है? मैं इसे कैसे

जमा करुँ?

 

हाँ, एक अर्ज़ी फीस होती है. केंद्र सरकार

के विभागों के लिए यह 10रु. है.

हालांकि विभिन्न राज्यों ने भिन्न फीसें

रखीं हैं. सूचना पाने के लिए, आपको 2रु.

प्रति सूचना पृष्ठ केंद्र सरकार के

विभागों के लिए देना होता है. यह

विभिन्न राज्यों के लिए अलग- अलग है.

इसी प्रकार दस्तावेजों के निरीक्षण के

लिए भी फीस का प्रावधान है. निरीक्षण

के पहले घंटे की कोई फीस नहीं है लेकिन

उसके पश्चात् प्रत्येक घंटे या उसके भाग

की 5रु. प्रतिघंटा फीस होगी. यह

केन्द्रीय कानून के अनुसार है. प्रत्येक

राज्य के लिए, सम्बंधित राज्य के नियम देखें.

आप फीस नकद में, डीडी या बैंकर चैक

या पोस्टल आर्डर जो उस जन प्राधिकरण

के पक्ष में देय हो द्वारा जमा कर सकते हैं.

कुछ राज्यों में, आप कोर्ट फीस टिकटें खरीद

सकते हैं व अपनी अर्ज़ी पर चिपका सकते हैं.

ऐसा करने पर आपकी फीस

जमा मानी जायेगी. आप तब

अपनी अर्ज़ी स्वयं या डाक से

जमा करा सकते हैं.

१२.मुझे क्या करना चाहिए यदि पीआईओ

या सम्बंधित विभाग मेरी अर्ज़ी स्वीकार

न करे?

 

आप इसे डाक द्वारा भेज सकते हैं. आप

इसकी औपचारिक शिकायत सम्बंधित

सूचना आयोग को भी अनुच्छेद 18 के तहत

करें. सूचना आयुक्त को उस अधिकारी पर

25000

रु. का दंड लगाने का अधिकार है

जिसने आपकी अर्ज़ी स्वीकार करने से

मना किया था.

 

१३.क्या सूचना पाने के लिए अर्ज़ी का कोई

प्रारूप है?

केंद्र सरकार के विभागों के लिए, कोई

प्रारूप नहीं है. आपको एक सादा कागज़ पर

एक सामान्य अर्ज़ी की तरह

ही अर्ज़ी देनी चाहिए. हालांकि कुछ

राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने

प्रारूप निर्धारित किये हैं. आपको इन

प्रारूपों पर ही अर्ज़ी देनी चाहिए.

कृपया जानने के लिए सम्बंधित राज्य के

नियम पढें.

 

१४.मैं सूचना के लिए कैसे अर्ज़ी दूं?

 

एक साधारण कागज़ पर अपनी अर्ज़ी बनाएं

और इसे पीआईओ के पास स्वयं या डाक

द्वारा जमा करें. (अपनी अर्ज़ी की एक

प्रति अपने पास निजी सन्दर्भ के लिए

अवश्य रखें)

 

१५.मैं अपनी अर्ज़ी की फीस कैसे दे सकता हूँ?

 

प्रत्येक राज्य का अर्ज़ी फीस जमा करने

का अलग तरीका है. साधारणतया, आप

अपनी अर्ज़ी की फीस ऐसे दे सकते हैं:

स्वयं नकद भुगतान

द्वारा (अपनी रसीद लेना न भूलें)

डाक द्वारा:

डिमांड ड्राफ्ट सेभारतीय पोस्टल आर्डर

सेमनी आर्डर से [केवल कुछ राज्यों में]कोर्ट

फीस टिकट से [केवल कुछ राज्यों में]बैंकर चैक

से

कुछ राज्य सरकारों ने कुछ खाते

निर्धारित किये हैं. आपको अपनी फीस

इन खातों में जमा करानी होती है.

इसके लिए, आप एसबीआई

की किसी शाखा में जा सकते हैं और

राशि उस खाते में जमा करा सकते हैं और

जमा रसीद अपनी आरटीआई अर्ज़ी के

साथ लगा सकते हैं. या आप

अपनी आरटीआई अर्ज़ी के साथ उस

विभाग के पक्ष में देय डीडी या एक

पोस्टल आर्डर भी लगा सकते हैं.

१६.क्या मैं अपनी अर्जी केवल पीआईओ के पास

ही जमा कर सकता हूँ?

नहीं, पीआईओ के उपलब्ध न होने

की स्थिति में आप अपनी अर्जी एपीआईओ

या अन्य किसी अर्जी लेने के लिए नियुक्त

अधिकारी के पास अर्जी जमा कर सकते हैं.

 

१७. क्या करूँ यदि मैं अपने पीआईओ या एपीआईओ

का पता न लगा पाऊँ?

 

यदि आपको पीआईओ या एपीआईओ

का पता लगाने में कठिनाई होती है तो आप

अपनी अर्जी पीआईओ c/o विभागाध्यक्ष

को प्रेषित कर उस सम्बंधित जन

प्राधिकरण को भेज सकते हैं. विभागाध्यक्ष

को वह अर्जी सम्बंधित पीआईओ के पास

भेजनी होगी.

१८.क्या मुझे अर्जी देने स्वयं जाना होगा?

आपके राज्य के फीस जमा करने के

नियमानुसार आप अपनी अर्जी सम्बंधित

राज्य के विभाग में अर्जी के साथ डीडी,

मनी आर्डर, पोस्टल आर्डर या कोर्ट फीस

टिकट संलग्न करके डाक द्वारा भेज सकते हैं.

केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629

डाकघरों को एपीआईओ बनाया गया है.

अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में

जाकर आरटीआई पटल पर अपनी अर्जी व

फीस जमा करा सकते हैं. वे आपको एक रसीद

व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर

का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित

पीआईओ के पास भेजे.

 

१९.क्या सूचना प्राप्ति की कोई समय

सीमा है?

हाँ, यदि आपने अपनी अर्जी पीआईओ

को दी है, आपको 30 दिनों के भीतर

सूचना मिल जानी चाहिए. यदि आपने

अपनी अर्जी सहायक पीआईओ को दी है

तो सूचना 35 दिनों के भीतर

दी जानी चाहिए. उन मामलों में

जहाँ सूचना किसी एकल के जीवन और

स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो,

सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध

हो जानी चाहिए.

 

२०.क्या मुझे कारण बताना होगा कि मुझे

फलां सूचना क्यों चाहिए?

बिलकुल नहीं, आपको कोई कारण या अन्य

सूचना केवल अपने संपर्क विवरण (जो हैं

नाम, पता, फोन न.) के अतिरिक्त देने

की आवश्यकता नहीं है. अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से संपर्क

विवरण के अतिरिक्त कुछ

नहीं पूछा जायेगा.

 

२१.क्या पीआईओ मेरी आरटीआई अर्जी लेने से

मना कर सकता है?

नहीं, पीआईओ आपकी आरटीआई अर्जी लेने से

किसी भी परिस्थिति में मना नहीं कर

सकता. चाहें वह सूचना उसके विभाग/

कार्यक्षेत्र में न आती हो, उसे वह स्वीकार

करनी होगी. यदि अर्जी उस पीआईओ से

सम्बंधित न हो, उसे वह उपयुक्त पीआईओ के

पास 5 दिनों के भीतर अनुच्छेद 6(2) के

तहत भेजनी होगी.

इस देश में कई अच्छे कानून हैं लेकिन उनमें से

कोई कानून कुछ नहीं कर सका. आप कैसे

सोचते हैं कि ये कानून करेगा?

यह कानून पहले ही कर रहा है.

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि स्वतंत्र भारत

के इतिहास में पहली बार कोई कानून

किसी अधिकारी की अकर्मण्यता के

प्रति जवाबदेही निर्धारित करता है.

यदि सम्बंधित अधिकारी समय पर

सूचना उपलब्ध नहीं कराता है, उस पर

250

रु. प्रतिदिन के हिसाब से

सूचना आयुक्त

द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है.

यदि दी गयी सूचना गलत है तो अधिकतम

25000

रु. तक

का जुर्माना लगाया जा सकता है.

जुर्माना आपकी अर्जी गलत कारणों से

नकारने या गलत सूचना देने पर

भी लगाया जा सकता है. यह जुर्माना उस

अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है.

२२. क्या अब तक कोई जुर्माना लगाया गया है?

हाँ, कुछ अधिकारियों पर केन्द्रीय व

राज्यीय

सूचना आयुक्तों द्वारा जुर्माना लगाया गया है.

क्या पीआईओ पर लगे जुर्माने

की राशि प्रार्थी को दी जाती है?

नहीं, जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में

जमा हो जाती है. हांलांकि अनुच्छेद 19 के

तहत, प्रार्थी मुआवजा मांग सकता है.

२३. मैं क्या कर सकता हूँ यदि मुझे सूचना न

मिले?

यदि आपको सूचना न मिले या आप प्राप्त

सूचना से संतुष्ट न हों, आप अपीलीय

अधिकारी के पास सूचना का अधिकार

अधिनियम के अनुच्छेद 19(1) के तहत एक

अपील दायर कर सकते हैं.

२४.पहला अपीलीय अधिकारी कौन होता है?

प्रत्येक जन प्राधिकरण को एक

पहला अपीलीय

अधिकारी बनाना होता है. यह

बनाया गया अधिकारी पीआईओ से वरिष्ठ

रैंक का होता है.

२४.क्या प्रथम अपील का कोई प्रारूप

होता है?

नहीं, प्रथम अपील का कोई प्रारूप

नहीं होता (लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने

प्रारूप जारी किये हैं). एक सादा पन्ने पर

प्रथम अपीली अधिकारी को संबोधित

करते हुए अपनी अपीली अर्जी बनाएं. इस

अर्जी के साथ अपनी मूल अर्जी व पीआईओ से

प्राप्त जैसे भी उत्तर (यदि प्राप्त हुआ

हो) की प्रतियाँ लगाना न भूलें.

२५.क्या मुझे प्रथम अपील की कोई फीस

देनी होगी?

नहीं, आपको प्रथम अपील की कोई फीस

नहीं देनी होगी, कुछ राज्य सरकारों ने

फीस का प्रावधान किया है.

 

२६.कितने दिनों में मैं अपनी प्रथम अपील

दायर कर सकता हूँ?

आप अपनी प्रथम अपील सूचना प्राप्ति के

30

दिनों व आरटीआई अर्जी दाखिल करने

के 60 दिनों के भीतर दायर कर सकते हैं.

 

२७.क्या करें यदि प्रथम अपीली प्रक्रिया के

बाद मुझे सूचना न मिले?

यदि आपको प्रथम अपील के बाद

भी सूचना न मिले तो आप द्वितीय

अपीली चरण तक अपना मामला ले जा सकते

हैं. आप प्रथम अपील सूचना मिलने के 30

दिनों के भीतर व आरटीआई अर्जी के 60

दिनों के भीतर (यदि कोई सूचना न

मिली हो) दायर कर सकते हैं.

२८.द्वितीय अपील क्या है?

द्वितीय अपील आरटीआई अधिनियम के

तहत सूचना प्राप्त करने का अंतिम विकल्प

है. आप द्वितीय अपील सूचना आयोग के पास

दायर कर सकते हैं. केंद्र सरकार के

विभागों के विरुद्ध आपके पास केद्रीय

सूचना आयोग है. प्रत्येक राज्य सरकार के

लिए, राज्य सूचना आयोग हैं.

२९.क्या द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप

है?

 

नहीं, द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप

नहीं है (लेकिन राज्य सरकारों ने द्वितीय

अपील के लिए भी प्रारूप निर्धारित किए

हैं). एक सादा पन्ने पर केद्रीय या राज्य

सूचना आयोग को संबोधित करते हुए

अपनी अपीली अर्जी बनाएं. द्वितीय

अपील दायर करने से पूर्व अपीली नियम

ध्यानपूर्वक पढ लें. आपकी द्वितीय अपील

निरस्त की जा सकती है यदि वह

अपीली नियमों को पूरा नहीं करती है.

 

३०.क्या मुझे द्वितीय अपील के लिए फीस

देनी होगी?

 

नहीं, आपको द्वितीय अपील के लिए कोई

फीस नहीं देनी होगी. हांलांकि कुछ

राज्यों ने इसके लिए फीस निर्धारित

की है.

३१.मैं कितने दिनों में द्वितीय अपील दायर

कर सकता हूँ?

आप प्रथम अपील के निष्पादन के 90

दिनों के भीतर या उस तारीख के 90

दिनों के भीतर कि जब तक आपकी प्रथम

अपील निष्पादित होनी थी, द्वितीय

अपील दायर कर सकते हैं.

३२.यह कानून कैसे मेरे कार्य पूरे होने में

मेरी सहायता करता है?

यह कानून कैसे रुके हुए कार्य पूरे होने में

सहायता करता है अर्थात् वह

अधिकारी क्यों अब वह आपका रुका कार्य

करता है जो वह पहले नहीं कर रहा था?

एक उदाहरण

आइए नन्नू का मामला लेते हैं. उसे राशन

कार्ड नहीं दिया जा रहा था. लेकिन जब

उसने आरटीआई के तहत अर्जी दी, उसे एक

सप्ताह के भीतर राशन कार्ड दे

दिया गया. नन्नू ने क्या पूछा? उसने निम्न

प्रश्न पूछे:

1. मैंने एक डुप्लीकेट राशन कार्ड के लिए

27

फरवरी 2004 को अर्जी दी.

कृपया मुझे मेरी अर्जी पर हुई दैनिक

उन्नति बताएं अर्थात् मेरी अर्जी किस

अधिकारी पर कब पहुंची, उस

अधिकारी पर यह कितने समय रही और

उसने उतने समय क्या किया?

2. नियमों के अनुसार, मेरा कार्ड 10

दिनों के भीतर बन जाना चाहिए था.

हांलांकि अब तीन माह से अधिक का समय

हो गया है. कृपया उन अधिकारियों के नाम

व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है कि वे

मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व जिन्होंने

ऐसा नहीं किया?

3. इन अधिकारियों के विरुद्ध

अपना कार्य न करने व जनता के शोषण के

लिए क्या कार्रवाई की जायेगी? वह

कार्रवाई कब तक की जायेगी?

4. अब मुझे कब तक अपना कार्ड मिल

जायेगा?

साधारण परिस्थितियों में, ऐसी एक

अर्जी कूड़ेदान में फेंक दी जाती. लेकिन यह

कानून कहता है कि सरकार को 30 दिनों में

जवाब देना होगा. यदि वे ऐसा नहीं करते

हैं, उनके वेतन में कटौती की जा सकती है. अब

ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना आसान

नहीं होगा.

पहला प्रश्न है- कृपया मुझे मेरी अर्जी पर

हुई दैनिक उन्नति बताएं.

कोई उन्नति हुई ही नहीं है. लेकिन

सरकारी अधिकारी यह इन शब्दों में लिख

ही नहीं सकते कि उन्होंने कई महीनों से

कोई कार्रवाई नहीं की है. वरन यह कागज़

पर गलती स्वीकारने जैसा होगा.

अगला प्रश्न है- कृपया उन अधिकारियों के

नाम व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है

कि वे मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व

जिन्होंने ऐसा नहीं किया.

यदि सरकार उन अधिकारियों के नाम व

पद बताती है, उनका उत्तरदायित्व

निर्धारित हो जाता है. एक

अधिकारी अपने विरुद्ध इस प्रकार कोई

उत्तरदायित्व निर्धारित होने के

प्रति काफी सतर्क होता है. इस प्रकार,

जब कोई इस तरह अपनी अर्जी देता है,

उसका रुका कार्य संपन्न हो जाता है.

मुझे सूचना प्राप्ति के पश्चात्

क्या करना चाहिए?

इसके लिए कोई एक उत्तर नहीं है. यह आप

पर निर्भर करता है कि आपने वह

सूचना क्यों मांगी व यह किस प्रकार

की सूचना है. प्राय: सूचना पूछने भर से

ही कई वस्तुएं रास्ते में आने लगतीं हैं.

उदाहरण के लिए, केवल

अपनी अर्जी की स्थिति पूछने भर से

आपको अपना पासपोर्ट या राशन कार्ड

मिल जाता है. कई मामलों में,

सड़कों की मरम्मत हो जाती है जैसे

ही पिछली कुछ मरम्मतों पर खर्च हुई

राशि के बारे में पूछा जाता है. इस तरह,

सरकार से सूचना मांगना व प्रश्न

पूछना एक महत्वपूर्ण चरण है, जो अपने आप

में कई मामलों में पूर्ण है.

लेकिन मानिये यदि आपने आरटीआई से

किसी भ्रष्टाचार या गलत कार्य

का पर्दाफ़ाश किया है, आप

सतर्कता एजेंसियों, सीबीआई को शिकायत

कर सकते हैं या एफ़आईआर भी करा सकते हैं.

लेकिन देखा गया है कि सरकार दोषी के

विरुद्ध बारम्बार शिकायतों के बावजूद

भी कोई कार्रवाई नहीं करती.

यद्यपि कोई भी सतर्कता एजेंसियों पर

शिकायत की स्थिति आरटीआई के तहत

पूछकर दवाब अवश्य बना सकता है.

हांलांकि गलत कार्यों का पर्दाफाश

मीडिया के जरिए भी किया जा सकता है.

हांलांकि दोषियों को दंड देने का अनुभव

अधिक उत्साहजनक है. लेकिन एक बात

पक्की है कि इस प्रकार सूचनाएं

मांगना और गलत कामों का पर्दाफाश

करना भविष्य को संवारता है.

अधिकारियों को स्पष्ट सन्देश मिलता है

कि उस क्षेत्र के लोग अधिक सावधान

हो गए हैं और भविष्य में इस प्रकार

की कोई गलती पूर्व

की भांति छुपी नहीं रहेगी. इसलिए उनके

पकडे जाने का जोखिम बढ जाता है.

क्या लोगों को निशाना बनाया गया है

जिन्होंने आरटीआई का प्रयोग किया व

भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया?

हाँ, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिनमें

लोगों को शारीरिक हानि पहुंचाई

गयी जब उन्होंने भ्रष्टाचार का बड़े पैमाने

पर पर्दाफाश किया. लेकिन इसका यह

अर्थ नहीं है

कि प्रार्थी को हमेशा ऐसा भय

झेलना होगा. अपनी शिकायत

की स्थिति या अन्य

समरूपी मामलों की जानकारी लेने के लिए

अर्जी लगाने का अर्थ प्रतिकार

निमंत्रित करना नहीं है.

ऐसा तभी होता है जब सूचना नौकरशाह-

ठेकेदार गठजोड़ या किसी प्रकार के

माफ़िया का पर्दाफाश कर

सकती हो कि प्रतिकार

की सम्भावना हो.

तब मैं आरटीआई का प्रयोग क्यों करुँ?

पूरा तंत्र इतना सड- गल चुका है

कि यदि हम सभी अकेले या मिलकर

अपना प्रयत्न नहीं करेंगे, यह

कभी नहीं सुधरेगा. यदि हम ऐसा नहीं करेंगे,

तो कौन करेगा? हमें करना है. लेकिन हमें

ऐसा रणनीति से व जोखिम को कम करके

करना होगा. व अनुभव से, कुछ रणनीतियां व

सुरक्षाएं उपलब्ध हैं.

ये रणनीतियां क्या हैं?

कृपया आगे बढें और किसी भी मुद्दे के लिए

आरटीआई अर्जी दाखिल करें. साधारणतया,

कोई आपके ऊपर एकदम हमला नहीं करेगा.

पहले वे आपकी खुशामद करेंगे

या आपको जीतेंगे. तो आप जैसे ही कोई

असुविधाजनक अर्जी दाखिल करते हैं, कोई

आपके पास बड़ी विनम्रता के साथ उस

अर्जी को वापिस लेने की विनती करने

आएगा. आपको उस व्यक्ति की गंभीरता और

स्थिति का अंदाजा लगा लेना चाहिए.

यदि आप इसे काफी गंभीर मानते हैं, अपने

15

मित्रों को भी तुंरत उसी जन

प्राधिकरण में उसी सुचना के लिए

अर्जी देने के लिए कहें. बेहतर होगा यदि ये

15

मित्र भारत के विभिन्न भागों से हों.

अब, आपके देश भर के 15

मित्रों को डराना किसी के लिए

भी मुश्किल होगा. यदि वे 15 में से

किसी एक को भी डराते हैं, तो और लोगों से

भी अर्जियां दाखिल कराएं. आपके मित्र

भारत के अन्य हिस्सों से अर्जियां डाक से

भेज सकते हैं. इसे मीडिया में व्यापक प्रचार

दिलाने की कोशिश करें. इससे यह

सुनिश्चित होगा कि आपको वांछित

जानकारी मिलेगी व आप जोखिमों को कम

कर सकेंगे.

क्या लोग जन सेवकों का भयादोहन

नहीं करेंगे?

आईए हम स्वयं से पूछें- आरटीआई

क्या करता है? यह केवल जनता में सच लेकर

आता है. यह कोई सूचना उत्पन्न नहीं करता.

यह केवल परदे हटाता है व सच जनता के

सामने लाता है. क्या वह गलत है?

इसका दुरूपयोग कब किया जा सकता है?

केवल यदि किसी अधिकारी ने कुछ गलत

किया हो और यदि यह सूचना जनता में

बाहर आ जाये. क्या यह गलत है

यदि सरकार में की जाने

वाली गलतियाँ जनता में आ जाएं व

कागजों में छिपाने की बजाय

इनका पर्दाफाश हो सके. हाँ, एक बार

ऐसी सूचना किसी को मिल जाए तो वह

जा सकता है व अधिकारी को ब्लैकमेल कर

सकता है. लेकिन हम गलत

अधिकारियों को क्यों बचाना चाहते है?

यदि किसी अन्य को ब्लैकमेल

किया जाता है, उसके पास भारतीय दंड

संहिता के तहत ब्लैकमेलर के विरुद्ध

एफ़आईआर दर्ज करने के विकल्प मौजूद हैं. उस

अधिकारी को वह करने दीजिये.

हांलांकि हम

किसी अधिकारी को किसी ब्लैकमेलर

द्वारा ब्लैकमेल किये जाने की संभावनाओं

को सभी मांगी गयी सूचनाओं को वेबसाइट

पर डालकर कम कर सकते हैं. एक ब्लैकमेलर

किसी अधिकारी को तभी ब्लैकमेल कर

पायेगा जब केवल वही उस सूचना को ले

पायेगा व उसे सार्वजनिक करने

की धमकी देगा. लेकिन यदि उसके

द्वारा मांगी गयी सूचना वेबसाइट पर

डाल दी जाये तो ब्लैकमेल करने

की सम्भावना कम हो जाती है.

क्या सरकार के पास आरटीआई

अर्जियों की बाढ नहीं आ जायेगी और यह

सरकारी तंत्र को जाम नहीं कर देगी?

ये डर काल्पनिक हैं. 65 से अधिक देशों में

आरटीआई कानून हैं. संसद में पारित किए

जाने से पूर्व भारत में भी 9 राज्यों में

आरटीआई कानून थे. इन में से किसी सरकार

में आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आई. ऐसे

डर इस कल्पना से बनते हैं कि लोगों के पास

करने को कुछ नहीं है व वे बिलकुल खाली हैं.

आरटीआई अर्ज़ी डालने व ध्यान रखने में

समय लगता है, मेहनत व संसाधन लगते हैं.

आईये कुछ आंकडे लें. दिल्ली में, 60 से अधिक

महीनों में 120 विभागों में 14000

अर्जियां दाखिल हुईं. इसका अर्थ हुआ कि 2

से कम अर्जियां प्रति विभाग प्रति माह.

क्या हम कह सकते हैं कि दिल्ली सरकार में

आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आ गई?

तेज रोशनी में, यूएस सरकार को 2003- 04

के दौरान आरटीआई अधिनियम के तहत 3.2

मिलियन अर्जियां प्राप्त हुईं. यह उस

तथ्य के बावजूद है कि भारत से उलट, यूएस

सरकार की अधिकतर सूचनाएं नेट पर

उपलब्ध हैं और लोगों को अर्जियां दाखिल

करने की कम आवश्यकता होनी चाहिए.

लेकिन यूएस सरकार आरटीआई अधिनियम

को समाप्त करने का विचार नहीं कर रही.

इसके उलट वे अधिकाधिक संसाधनों को इसे

लागू करने में जुटा रहे हैं. इसी वर्ष, उन्होंने

32

मिलियन यूएस डॉलर इसके

क्रियान्वयन में खर्च किये.

क्या आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन

में अत्यधिक संसाधन खर्च नहीं होंगे?

आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन में

खर्च किये गए संसाधन सही खर्च होंगे. यूएस

जैसे अधिकांश देशों ने यह पाया है व वे

अपनी सरकारों को पारदर्शी बनाने पर

अत्यधिक संसाधन खर्च कर रहे हैं. पहला,

आरटीआई पर खर्च लागत उसी वर्ष

पुनः उस धन से प्राप्त हो जाती है

जो सरकार भ्रष्टाचार व गलत कार्यों में

कमी से बचा लेती है. उदहारण के लिए, इस

बात के ठोस प्रमाण हैं कि कैसे आरटीआई के

वृहद् प्रयोग से राजस्थान के सूखा राहत

कार्यक्रम और दिल्ली की जन वितरण

प्रणाली की अनियमितताएं कम हो पायीं.

दूसरा, आरटीआई लोकतंत्र के लिए बहुत

जरुरी है. यह हमारे मौलिक

अधिकारों का एक हिस्सा है.

जनता की सरकार में भागीदारी से पहले

जरुरी है कि वे पहले जानें

कि क्या हो रहा है. इसलिए, जिस प्रकार

हम संसद के चलने पर होने वाले खर्च

को आवश्यक मानते हैं, आरटीआई पर होने

वाले खर्च को भी जरुरी माना जाये.

लेकिन प्राय

लोग निजी मामले सुलझाने के लिए

अर्जियां देते हैं?

जैसा कि ऊपर दिया गया है, यह केवल

जनता में सच लेकर आता है. यह कोई

सूचना उत्पन्न नहीं करता. सच छुपाने

या उस पर पर्दा डालने का कोई प्रयास

समाज के उत्तम हित में नहीं हो सकता.

किसी लाभदायक उद्देश्य की प्राप्ति से

अधिक,

गोपनीयता को बढावा देना भ्रष्टाचार

और गलत कामों को बढावा देगा. इसलिए,

हमारे सभी प्रयास सरकार

को पूर्णतः पारदर्शी बनाने के होने

चाहिए. हांलांकि, यदि कोई किसी को आगे

ब्लैकमेल करता है, कानून में इससे निपटने के

प्रचुर प्रावधान हैं. दूसरा, आरटीआई

अधिनियम के अनुच्छेद 8 के तहत कई बचाव

भी हैं. यह कहता है, कि कोई

सूचना जो किसी के निजी मामलों से

सम्बंधित है व इसका जनहित से कोई लेना-

देना नहीं है को प्रकट नहीं किया जायेगा.

इसलिए, मौजूदा कानूनों में लोगों के

वास्तविक उद्देश्यों से निपटने के पर्याप्त

प्रावधान हैं.

लोगों को ओछी/ तुच्छ अर्जियां दाखिल

करने से कैसे बचाया जाए?

कोई अर्ज़ी ओछी/ तुच्छ नहीं होती. ओछा/

तुच्छ क्या है? मेरा पानी का रुका हुआ

कनेक्शन मेरे लिए सबसे संकटपूर्ण

हो सकता है, लेकिन एक नौकरशाह के लिए

यह ओछा/ तुच्छ हो सकता है. नौकरशाही में

निहित कुछ स्वार्थों ने इस ओछी/ तुच्छ

अर्जियों के दलदल को बढाया है. वर्तमान

में, आरटीआई अधिनियम

किसी भी अर्ज़ी को इस आधार पर निरस्त

करने की इजाज़त नहीं देता कि वो ओछी/

तुच्छ थी. यदि ऐसा हो, प्रत्येक पीआईओ हर

दूसरी अर्ज़ी को ओछी/ तुच्छ बताकर

निरस्त कर देगा. यह आरटीआई के लिए मृत

समाधि के समान होगा.

फाइल टिप्पणियां सार्वजनिक

नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह

ईमानदार अधिकारियों को ईमानदार

सलाह देने से रोकेगा?

यह गलत है. इसके उलट, हर

अधिकारी को अब यह

पता होगा कि जो कुछ भी वो लिखता है

वह जन- समीक्षा का विषय हो सकता है.

यह उस पर उत्तम जनहित में लिखने

का दवाब बनाएगा. कुछ ईमानदार

नौकरशाहों ने अलग से स्वीकारा है

कि आरटीआई ने उनकी राजनीतिक व अन्य

प्रभावों को दरकिनार करने में बहुत

सहायता की है. अब अधिकारी सीधे तौर

पर कहते हैं कि यदि उन्होंने कुछ गलत

किया तो उनका पर्दाफाश

हो जायेगा यदि किसी ने उसी सूचना के

बारे में पूछ लिया. इसलिए, अधिकारियों ने

इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया है

कि वरिष्ठ अधिकारी लिखित में निर्देश

दें. सरकार ने भी इस पर मनन

करना प्रारंभ कर दिया है कि फाइल

टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम

की सीमा से हटा दी जाएँ. उपरोक्त

कारणों से, यह नितांत आवश्यक है कि फाइल

टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम

की सीमा में रहें.

जन सेवक को निर्णय कई दवाबों में लेने होते

हैं व जनता इसे नहीं समझेगी?

जैसा ऊपर बताया गया है, इसके उलट, इससे

कई अवैध दवाबों को कम

किया जा सकता है.

सरकारी रेकॉर्ड्स सही आकार में नहीं हैं.

आरटीआई को कैसे लागू किया जाए?

आरटीआई तंत्र को अब रेकॉर्ड्स सही आकार

में रखने का दवाब डालेगा. वरन

अधिकारी को अधिनियम के तहत दंड

भुगतना होगा.

विशाल जानकारी मांगने

वाली अर्जियां रद्द कर देनी चाहिए?

यदि मैं कुछ जानकारी चाहता हूँ, जो एक

लाख पृष्ठों में आती है, मैं

ऐसा तभी करूँगा जब मुझे

इसकी आवश्यकता होगी क्योंकि मुझे उसके

लिए 2 लाख रुपयों का भुगतान

करना होगा. यह एक स्वतः ही हतोत्साह

करने वाला उपाय है. यदि अर्ज़ी इस आधार

पर रद्द कर दी गयी, तो प्रार्थी इसे

तोड़कर प्रत्येक अर्ज़ी में 100 पृष्ठ मांगते

हुए 1000 अर्जियां बना लेगा, जिससे

किसी का भी लाभ नहीं होगा. इसलिए, इस

कारण अर्जियां रद्द नहीं होनी चाहिए

कि:

"लोगों को केवल अपने बारे में सूचना मांगने

दी जानी चाहिए. उन्हें सरकार के अन्य

मामलों के बारे में प्रश्न पूछने की छूट

नहीं दी जानी चाहिए", पूर्णतः इससे

असंबंधित है:

आरटीआई अधिनियम का अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से यह

नहीं पूछा जा सकता कि क्यों वह कोई

जानकारी मांग रहा है. किसी भी मामले में,

आरटीआई इस तथ्य से उद्धृत होता है

कि लोग टैक्स/ कर देते हैं, यह उनका पैसा है

और इसीलिए उन्हें यह जानने का अधिकार

है कि उनका पैसा कैसे खर्च हो रहा है व कैसे

उनकी सरकार चल रही है. इसलिए

लोगों को सरकार के प्रत्येक कार्य

की प्रत्येक बात जानने का अधिकार है. वे

उस मामले से सीधे तौर पर जुड़े हों या न

हों. इसलिए, दिल्ली में रहने

वाला व्यक्ति कोई भी सूचना मांग

सकता है चाहे वह तमिलनाडु की हो.

आरटीआई अधिनियम का अनुच्छेद 6(2)

स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से यह

नहीं पूछा जा सकता कि क्यों वह कोई

जानकारी मांग रहा है. किसी भी मामले में,

आरटीआई इस तथ्य से उद्धृत होता है

कि लोग टैक्स/ कर देते हैं, यह उनका पैसा है

और इसीलिए उन्हें यह जानने का अधिकार

है कि उनका पैसा कैसे खर्च हो रहा है व कैसे

उनकी सरकार चल रही है. इसलिए

लोगों को सरकार के प्रत्येक कार्य

की प्रत्येक बात जानने का अधिकार है. वेउस मामले से सीधे तौर पर जुड़े हों या न

हों. इसलिए, दिल्ली में रहने

वाला व्यक्ति कोई भी सूचना मांग

सकता है चाहे वह तमिलनाडु की हो.

Sunday, 13 November 2011

वृक्ष लगाओ, पर्यावरण बचाओ

एक आदमी एक दिन में इतना ऑक्सीजन
लेता है जितने में 3 ऑक्सीजन के सिलेंडर भरे
जा सकते हैं | एक ऑक्सीजन सिलेंडर
की कीमत होती है रु.700 इस तरह हम
देखते हैं कि एक आदमी एक दिन में रु.2100
(700X3) की ऑक्सीजन लेता है और 1 साल
में रु.766500 कि और अपने पूरे जीवन (अगर
आदमी कि उम्र 65 साल हो) में लगभग रु.
5 करोड़ का ऑक्सीजन लेता है जो कि पेड़-
पौधों द्वारा हमे फ्री में मिलता है और हम
उन्ही पेड़ पौधों को समाप्त कर रहे है |

आंख भर चितराम

*पाठकीय दृष्टि*

*कविताओं के मुंह बोलते चितराम*


'आंख भर चितराम' वरिष्ठ कवि ओम
पुरोहित 'कागद'
की राजस्थानी कविताओं का ताजा
संग्रह है जिसमें कवि ने वर्णन व विवरण से
आगे बढकर कविता को नूतन भाव-भूमि
सौंपी है । इन कविताओं की विषय-वस्तु
हमारे आस-पास के परिवेश की है मगर
कविताओं की बुणगट कवि की सूक्ष्म व
पैनी दृष्टि का परिचय देती है । शब्दों से
चाक्षुष बिम्बों की मार्फत दृश्य के रूप में
उतरती इन कविताओं में राजस्थानी
कविता के बदलते मिजाज को रेखांकित
किया जा सकता है । कवि की कल्पना व
मौलिक
दृष्टि से ये शब्द चित्र पाठक
को मन्त्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं ।
आठ खंडो में बंटे इस कविता संग्रह में
प्रकृति के साथ कवि का घरोपा स्पष्ठ
रूप
से देखा जा सकता है । संग्रह की थार,
बादळ, अडवो, खेजडी, एवं काळीबंगा
श्रृंखला की कविताओं में
राजस्थानी धरा की विविधरूपा अभिव्यक्ति हुई
है । इन
कविताओं में कहीं चिड़िया अड़वे की बाजू
में घुसने-निकलने का खेल खेलती नजर आती
है तो कहीं उजाड मरुस्थल में बिना लूंग
खडी बूढी खेजडी हाथों में रावणहत्था
लिये कलावती जैसी लगती है । इन
चित्रों में कहीं हरियल
खेजडी की चूंद्डी में
चन्द्रमा 'त्या' करता है
तो कहीं पक्षी अडवे की बाजू-जेब में अंडे
देते हैं ।
यहां कवि थार को विधना की 'सोनळ-
सेज' के रूप में चित्रित करता है तो मरूधर
की
रेत उसे पानी व बादलों की तलाश में
भटकती मिलती है ।
खेजडी को 'लूंठी सराय'
बताता हुआ कवि पूछ्ता है- "बसै कठै/
कीडी-कांटा/मोर-पखेरू/छोड
खेजडी।" (पृ. ३५)
राजस्थानी लोक जीवन का इतना सहज-
स्वाभाविक रूप इन कविताओं में प्रकट हुआ
है कि
पाठकीय चेतना मरूभौम की महक से
आप्लावित हो जाती है । 'कागद'
की कविताओं में
'लोक' महज नॊस्टेल्जिया की नहीं,
बल्कि रचाव की भूमि के रूप में आया है।
इन
कविताओं में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान
बोलता-बतियाता है।
मरूधरा का भौगोलिक
परिवेश, सांस्कृतिक परम्पराएं, अकाल,
आदि प्राकृतिक आपदाएं, जीवन संघर्ष इन
कविताओं में सहज रूप से उजागर हुआ है।
'काळीबंगा' शीर्षक खंड की इक्कीस
कविताओं की लड़ी इस किताब को खास
बना देती है।
हनुमानगढ जिले के काळीबंगा गांव में तीन
हजार वर्षों से भी अधिक पुरानी सभ्यता
के अवशेषों का अवलोकन
करती कवि की दृष्टि इन कविताओं में एक
भरी-पूरी दुनिया
के उजड़ने की त्रासदी को सामुदायिक
नजरिए से देखती है। 'काळीबंगा रो
मून/बतावै/एक जात/आदमजात/
जकी भेळी जागी/भेळी ही सोई/भेळप
निभाई/ढिगळी होवण
तांई।'(पृ. ७१)
कवि कालीबंगा के थेहड़ में जीवन के
चिन्हों की पड़ताल करते हुए स्वर्णिम
अतीत से
मिट्टी में मिलने की करूण
यात्रा को प्रत्यक्ष कर देता है।
मानवीय दृष्टि से
इस तरह इतिहास की जनपक्षीय पड़ताल
राजस्थानी कविता में पहली बार पढने
को मिली
है।
प्रकृति के विभिन्न रंगो से साक्षात
करवाती इस काव्यकृति की झूठ और मन
खंड की
कविताओं का स्वर अन्य रचनाओं से किंचित
अलहदा लगता है वहीं नवीन जैन की
फोटोग्राफी देखकर रचित 'जातरा'
सीरीज की कविताओं में पाठक
को उनकी प्रेरक फोटो
की कमी अखरती है।
यद्यपि कम से कम शब्दों में बात कहने
का हुनर व लय पर कवि की पकड़ से इन
कविताओं का शिल्प सशक्त नजर आता है।
ये चितराम पाठक को न केवल एक एलबम
देखने
के आनंद का अहसास करवाते हैं
बल्कि इनकी गूंज उसके मन-मस्तिष्क
को चिन्तन-मनन
के लिये भी प्रेरित करती है।
राजस्थानी कविता के नए तेवर से रूबरू
होने के
लिये इस संग्रह का तन्मयतापूर्ण पाठ
जरूरी है।
*
-मदन गोपाल लढ़ा*

'कागद' की कुछ कविताएँ

आं ईंटां रै
ठीक बिचाळै
पड़ी आ
काळी माटी नीं
राख है चूल्है री
जकी ही काळीबंगा में
कदै'ई चेतन
चुल्लै माथै
कदै'ई तो
सीजतो हो
खदबद खीचड़ो
कोई तो हा हाथ
जका परोसता
घालता पळियै सूं घी
भेळा जीमता
टाबरां नै ।

***

माटी रो
ओ गोळ घेरो
कोई मांडणो नीं
ऐनाण है डफ रो
काठ सूं
माटी होवण री जातरा रो ।
डफ हो
तो भेड भी ही
भेड ही
तो चरावणियां भी हा
चरावणियां हा तो
हाथ भी हा
हाथ हा तो
ओ क्यूं हो
मीत हा
गीत हा
प्रीत ही
जकी निभगी
माटी होवण तक ।


***

कठै राजा
कठै परजा
कठै सत्तू-फत्तू
कठै अल्लाद्दीन दब्यो
घर सूं निकळ
थेड़ काळीबंगा रो
हाडक्यां भी मून है
नीं बतावै
आपरो दीन-धरम ।


***


भोत तळै जाय'र
नीसरयो है कूओ
रास रा निसाण
आपरै मुंडै री
समूळी गेळाई में
कोरियां ऐनाण
पण नीं बतावै
किण दिस
कुण जात
भरती ही पाणी !
काळीबंगा रो मून
बतावै
एक जात
आदमजात
जकी
भेळी जागी
भेळी ई सोई
भेळप निभाई
ढिगळी होवण तांई ।
***

खेजङलो (कन्हैयालाल सेठिया)

म्हारै मुरधर रो है सांचो,
सुख दुख साथी खेजड़लो,
तिसां मरै पण छयां करै है
करड़ी छाती खेजड़लो,
आसोजां रा तप्या तावड़ा
काचा लोही पिळघळग्या,
पान फूल री बात करां के
बै तो कद ही जळबळग्या,
सूरज बोल्यो छियां न छोडूं
पण जबरो है खेजड़लो,
सरणै आय'र छियां पड़ी है
आप बळै है खेजड़लो;
सगळा आवै कह कर ज्यावै
मरु रो खारो पाणी है,
पाणी क्यां रो ऐ तो आंसू
खेजड़लै ही जाणी है,
आंसू पीकर जीणो सीख्यो
एक जगत में खेजड़लो,
सै मिट ज्यासी अमर रवैलो
एक बगत में खेजड़लो,
गांव आंतरै नारा थकग्या
और सतावै भूख घणी,
गाडी आळो खाथा हांकै
नारां थां रो मरै धणी,
सिंझ्या पड़गी तारा निकळ्या
पण है सा'रो खेजड़लो,
'आज्या' दे खोखां रो झालो
बोल्यो प्यारो खेजड़लो,
जेठ मास में धरती धोळी
फूस पानड़ो मिलै नहीं,
भूखां मरता ऊंठ फिरै है
ऐ तकलीफां झिलै नहीं,
इण मौकै भी उण ऊंठां नै
डील चरावै खेजड़लो,
अंग-अंग में पीड़ भरी पण
पेट भरावै खेजड़लो,
म्हारै मुरधर रो है सांचो
सुख दुख साथी खेजड़लो
तिसां मरै पण छयां करै है
करड़ी छाती खेजड़लो ।

उडीकै है पींपळ

उजड़्योड़ै कुंभाणै री
गुवाड़ में ऊभो
ओ पींपळ
फ़गत एक रूंख कोनी
गांव रै बडेरै गळांई है
जको लारै छूटग्यो.
इकचालीस रै साल
तोपाभ्यास सारू
जिण चौंतीस गांवां री जमीं
सेना नै सूंपीजी
उण में एक हो कुंभाणो.
गांव जैड़ो गांव हो कुंभाणो
जीतो जागतो
एक काळजै धड़कतो गांव
सवा सौ घरां री बस्ती
जठे पड़तख दीसता
जूण रा हजार रंग.
ठाकुर जी रै मिंदर रै नगाड़ै सागै
ऊगतो हो दिन
अर इण पींपळ हेठै ई
गुरबत बिचाळै बिसूंजतो
भोर सू आथण तांई
खेत रो खोरसो
डांगरा री टंडवाळी
आसरा री सार-संभाळ
तीज-तिंवार रा नेगचार
सांचाणी सतरंगी हो
जीवण रो आंगणो.
पींपळ रै डावै पासै
भंवरियै कुवै माथै
पणिहारियां री लेण कोनी टूटती
गौर पूजण
जद गांव री छोरिया-छापरियां
पींपळ हेठै भेळी हुय'र
गीतां रा सुर छेड़ती
उण घड़ी पींपळ रै हिवड़ै
उमाव मावड़तो कोनी
काती में भोरानभोर
गांव री लुगायां
भजनां भेळी
पैलपोत
पींपळ ई सींचती.
पण अबै कठै बो कुंभाणो
हणै तो साव उजाड़ है
ओळूं नै टाळ'र'
जमींदोट हुयोड़ा ढूंढां
बिना छात रा आसरा
बिना भींतां री बाखळ
माणस बिहूणो
बांडो बूचो गांव
घणो अणखावणो लागै.
अबै कोनी सुणीजै
दिन छिपतां ई
बावड़तै पसुवां री टण-टणाट
कोनी दीसै
पोसाळ में टाबरियां रा टोळ
फ़गत हवा री सूंसाट
मून सागै
बाथेड़ो करती लखावै.
कुंभाणै रै एनाणां री
साव एकलो
रुखाळी करतो
बूढ़ियो पींपळ ई
अणमनो-सो दिन टिपावै
जाणै डोकरो
उडीकतो हुवै
कै कदी कोई
नूंवो परणीज्योड़ो जोड़ो
गंठजोड़ै री जात रै मिस
उणै हेठै आय'र बैठ जावै
अर बडेरो पींपळ
आसीस रै ओळांवै
आपरी बच्योड़ी उमर सूंप'र
मुगत हुय जावै.

जीवन चक्र

बचपन में देखा करता था
गाँव में पैसे भेजता हुआ पिता !
मजाल है कि एक भी महीना,
कभी गया हो इससे रीता !!
हर माह पहली तारीख को
बंधा हुआ एक निश्चित क्रम !
जो कभी टूट न पाया
बाबा क़े जीवन पर्यंत !
सोचा करता था,
पैंट मेरी कब से है फटी हुई
माँ करती रहती है पैबंद उसे
इन्हे तो मेरी कोई चिंता ही नहीं
बेटे से बड़ा हो गया पिता उन्हें !
आज मै भी करता रहता हूँ,
हर पहली तारीख का इंतजार !
जो इसी तरह निकल जाती है
रीती हुई बार बार !!
आज मै बड़ा नहीं हूँ,
क्यों कि मेरे बेटे को
चिंता है ज्यादा मुझसे,
मेरे अपने पोते क़ी....!

- दिनेश मिश्र

Saturday, 12 November 2011

झांसी की रानी

सिंहासन हिल उठे
राजवंशों ने
भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने
पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में
ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार
पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन
छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान
अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग
खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण,
कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद
ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं
वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के
वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब
शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय
खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य
भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई
झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई
झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई
झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से
मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में
उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर
लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब
भाई,
रानी विधवा हुई, हाय!
विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-
समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में
हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर
पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर
अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश
राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई
बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट
शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह
भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई
काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने
पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब
महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ
छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर
का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन
बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ
था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास
आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से
थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख
हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ
बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत
अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने
पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब
सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर
दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई
ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई
थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई
थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई
थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई
थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल
उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए
काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर
अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक
अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके
नाम।
लेकिन आज जुर्म
कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के
मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द
बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे
बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध
असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब
हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील
निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग
तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से
हार,
विजयी रानी आगे चल दी,
किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने
छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर
सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ
की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई
थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार
मचाई थी।
पर पीछे ह्

सबद साधना रा पांच चितराम


सबद साधना रा पांच चितराम

   (स्व. गुरूदेव नानूराम जी संस्कर्ता की स्मृति में)





   
 एक

म्हैं काळू में इग्यारहवीं जमात में पढतो। ऐक दिन ऐक जळसे में गुरूजी नानूराम संस्कर्ता रो विद्यालय में आवणो हुयो। गुरूजी सागै म्हारौ परिचय हो। जळ्से पछै म्हैं गुरूजी ने बतायो क म्हारी साहित्य मांय रुचि है। म्हनैं मायड भासा री रचनावां घणी चोखी लागै। म्हैं राजस्थानी सीखणी ई चावूं। गुरूजी म्हनै आपरी पोथी ‘गांव-गिगरथ‘ पढणै खातर कैयो जिण सूं राजस्थानी सबदां रो ग्यान बंधे। आप आथण म्हनै घरै बुलायो अर पोथी देवण री हामळ भरी। म्है उणं दिन गुरूजी रै अठै जा नीं सक्यो। अगलै दिन म्हैं सिनान कर’र बाखळ में बैठ्यो अखबार बांचै हो जणा देख’र हरख हुयो क गुरूजी खुद म्हारै घरै(नानेरै) पधारया है। आप म्हनैं ‘गांव-गिगरथ‘ पोथी सूंपी अर राजस्थानी पढण-लिखण री सीख दीवी।

  दो


ऐक दिन म्हैं सरस्वती पुस्तकालय में गुरूजी नैं म्हारी कविता सुणायी अर उण में सुधार री ई अरज करी। गुरूजी म्हनै अगलै दिन सबेरै आठ बजे घरै बुलायो। दिनुगै जणा म्हारी आंख खुली तो घड़ी आठ बजा राख्या। म्हैं तावळो-सी न्हायो अर सिरावण कर’र गुरूजी रै घर कांनी टुरग्यो। गुरूजी रो आठ बजे रो आवणै रो कैयोड़ो अर म्हैं पूण घण्टा देरी सूं चालै हो। घर रे बारलै मोड़ा सूं तकायो तो गुरूजी आपरै आफिस रै थळी बिचाळै बैठ्या ‘जागती जोत‘ बांचै हा। म्हैं म्हारी लिख्योड़ी कविता ‘भारत वंदना‘ आपरै आगै कर दी। गुरूजी छन्द रै मुजब कविता बांची अर जरूरी सुधार ई करया। १६-१६ मात्रावां रो छन्द हो। म्हैं गुरूजी नै बतायो क ‘लंकाण-धणी‘ रे दूजै साका नै बांच’र म्हैं आ कविता लिखी है। गुरूजी मांय-मांय ई मुळक्या अर ‘लंकाण धणी‘ री ऐ ओळ्यां गुणगुणावण लागग्या-
 "राड़ जिन्दगी रो वसाव है
 सुख दुख पोळ सरीरां आवै।
 होड़ झोड़ दौड दौडतां
 मिनखपणै रो नांव कमावै॥"


  तीन

ऐक दिन ठा पड्यो के गुरूजी री तबीयत नरम है। डाकदर आराम करणै री सलाह दीवी है। म्हैं उण घड़ी ई गुरूजी सूं मिलणै खातर चाल पड्यो घरै कमरै मांय माचै माथै गुरूजी सूत्या हा। सिरांथै एक थेली मांय धोबो खण दुवायां पड़ी ही। म्हनैं देख’र हरा हुग्या- ‘आव रे लढा।  केइ दिनां सूं आवणो हुयो।’ म्हैं खंनै ई पीढै माथै बैठग्यो अर तबीयत बाबत लागग्यो। पण गुरूजी नै तबीयत री फिकर कठै। दो-च्यार मिनटां में बात कविता माथै खींच लाया।
’टोळां री टोळी सी ल्यासी, सावण बीरो मेह बरसासी
सावण सुख उपजावण सब रै, मेहां रो मांझीड़ो आसी’
घर मांय म्हनैं बतायो क डाकदर आपनै अबा’र कविता लिखण पढण नै मना करयो है। इण सूं आराम में बिझोळ पड़ै। गुरूजी बोल्या- बावळो है डाकदर। कविता रै ताण ई तो जीवूं हूं। इणनै छोडण री बात ई कियां सोचीजै। अर आप भळै ’कळायण’ सूं गीत सुणावण लागग्या। म्हैं साहित्य अर आपरै सगपण बाबत सोचतो गीत सुणतो रैयो।



 च्यार


कथाकार रामस्वरूप किसान रै लघु कथा संग्रह ’सपने रो सपनो’ रो विमोचन काळू में गुरूजी रे हाथां हुयो। समारोह मांय विमोचित पौथी माथै कम राजस्थानी भासा री मान्यता बाबत बेसी बात हुयी। सगळा वक्ता राजस्थानी री मान्यता खातर जन आन्दोलन री जरूरत बतायी। गुरूजी  अध्क्षता करतां थकां कैयो- ‘आ बिचारजोग बात है कि राजस्थानी की मान्यता खातर राजस्थानियां सूं ई संघर्ष सारू आगै आवणै रो आह्वान करणो पडै। सुवाल फगत भासा रो नीं वजूद रो है।’ गुरूजी री ऐ ओळ्यां घिर-घिर चेते आवै ’भासा लारै छूटण सूं राजस्थानी संस्कृति री रंगत फीकी पड़ रैयी है। संस्कृति नै बचावणी है तो भासा नै बचावो नींतर राजस्थान री निजू पिछाण तकात खतम हुय जावैला।’


  पांच

महाजन मांय गुरूजी रै पोतै रो व्याह हो। गुरूजी ई महाजन पधारया। घूमतां-फिरतां गुरूजी एडवोकेट राजीव सोमाणी रै घरै पधारया। बठै म्हैं, शिक्षक मूलचन्द बोहरा, भवानीशंकर शर्मा आद गुरूजी सूं कवितावां सुणावणै री अरज करी। गुरूजी कविता सुणायी ‘थे भूल रैया क्यूं भासा नै,जो मायड़ राजस्थानी है।‘ ‘दस दात‘ पोथी सूं भींग, मामोलिया, मोठ, सेवण, सांगरी, रोहिड़ा माथै सोरठा ई सुणाया। सगळा घणां राजी हुया। उण दिन गुरूजी रै पोतै रो सावो बैठणो हो। घरै सगळा गुरूजी ने अडीकै हा। कणीं आय’र गुरूजी नै कैयो जणां चेतो करयो है अर म्हाने सगळा नै लेय’र व्याह आळै घर कांनी टुरग्या।


  -डॊ.मदन गोपाल लढा
   १४४,लढा निवास,महाजन

Friday, 11 November 2011

अद्‌भुत संयोग

आज के इस अद्‌भुत संयोग का गवाह बनने वालोँ को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाईयाँ

--
गंगासागर सारस्वत

Thursday, 10 November 2011

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।


-पँ माखनलाल चतुर्वेदी

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Wednesday, 9 November 2011

बच्चे काम पर जा रहे हैं

कोहरे से ढँकी सङक पर बच्चे काम पर जा रहे हैँ
सुबह सुबह


बच्चे काम पर जा रहे हैँ
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे सवाल की तरह


काम पर क्योँ जा रहे हैँ बच्चे?

क्या अंतरिक्ष मेँ गिर गई हैँ सारी गेँदेँ
क्या दीमकोँ ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबोँ को
क्या काले पहाङ के नीचे दब गए हैँ सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैँ
सारे मदरसोँ की इमारतें


क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरोँ के आँगन
खत्म हो गए हैँ एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया मेँ?
कितना भयानक होता अगल ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह
कि हैँ सारी चीजेँ हस्बमामूल

पर दुनिया की हज़ारोँ सड़कोँ से गुजरते हुए
बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैँ।

-राजेश जोशी

Tuesday, 8 November 2011

स्व. नानूराम जी सँस्कर्ता

मिनखां बिगङया म्हेँदरा थिगै जिनावर
थाट।
पंछी उडै अबै-दरा, बंजङ बारा वाट॥1॥
दिन दोरा उमस-भरया काटां दुखङा देख।
'गिणतां घिसी आसाढ-नै आंगळियां री रेख'
॥2॥
कीकर-कैरां, कूमटां जङ-जाखङ, झुंडझांस।
वन बंजङ, बीहङ बळया फोगी, फोग,
फरांस॥3॥
मुरधर मंगळ रूप, जठै जंगळ भळ भारी।
दंगळ धोरा, डैर, मैर मुरङा मझधारी।
दाइया भोमी-भाग अखङ भांती-
रा सारा।
धोरा, डहरी, ताल, पाळ, परबत बेचारा।
भुरट, मुरट, धामण धरा ना,
धूंधा धोरा घास है।
खीँपा, पीँपा फोगङा मेँ ठूंठा थोथा ठांस
है॥4॥
बूठ कळायण! मुर-धरा पूरण आखी आस।
तो तूंठ्या रुङी रूतां, मोजां बारां मास॥
5॥
होसी जेठू बाजरी, वासी मोभी पूत।
खासी दुनिया दूर-री, करे कळायण कूंत॥
6॥
भोम मोम ज्यूं गळ रयी, उमस ओग अथोग।
ग्रीखम भावण रातङ्या दिवसां दाझै
लोग॥7॥
चेतो कर चित मांय हरख-सूं आव हठीली।
बिरंगी-सी बणराय बणात रंग-रंगीली।
छैके हाली आव छबीली! देती ठेका।
मोरां मन हुळसाय मगेजण! सुणज्या केका।
घुरा नगारा गैरी घुळज्या उमस
उनाळो मारणै।
जोङा झोळ झिळोळ भरणै आव कळायण!
तारणै॥8॥
जेठ महीनै जोर-री चंचळ लू चाली।
नीर लुकायो लोयणां, ज्यूं ठीकर ठाली॥
9॥
आख्यां आडो काच-सो, सूक्या आंसूङा।
बैठा झीणी झाङख्यां तिस मरता मिरगा॥
10॥
बिरखां बिलखा सूवटा, मोर कूवटां केळ।
गायां छायां-छानङया,खोल्यां उभी खेळ॥
11॥
हरया रवै ना रुँख, सूकग्या सगळा सारा।
हरी तुसर ना मिलै ओखदां-तणी तिवारां।
बाळक सैवे गोद डसाडस उमस-झाळां।
मात पळूसै माथ, पसेवो चाल्यो खाळां।
मूवा-सा बाळक हुवा है लाय लुवां-री ताप
तळ।
मांचां पर बूढा-बढैरा सिसकै तपती बीच
बळ॥12॥
उमस-ओग तन माणसां फुणसी-फोङा होय।
उधङ अळायां चमचमै, खाज खुसी री खोय॥
13॥
टाबरिया भाज्या बगै झलती ताती लाय।
बळता पांव घसोङता पोटां मेँ चिरळाय॥
14॥
छायां आयां छोकरा पग ठंडा कर लेय।
इसङी ताती धूङ-नै टाबर निकळै खेय॥15॥
घास नहीँ भर-पेट, भेङङ्या लौटे भूखी।
झट कोठा लै सोख, खेळियां कर दै सूखी।
सांडा टोडां टोळ टुळककर कूवै आया।
नीर मिलै तो मिलै, नहीँ तो रवै तिसाया।
गंडकङा गळियां फिरै है
तिसिया ताप्या तावङै।
ऐ मौजां उण दिन करैला, जिण दिन
वरसा बावङै॥16॥
झूरै जाझा जीवङा मुरधर बिन बरखा।
उझळ उनाझै ओग मेँ उण-मुण उणियारा॥17॥
आंचळ आंसू पूंछती नार्यां निरख निरख
रही।
आसी अवस उडीक पर, सजनी! समझ सही॥
18॥
बिन जळ ज्यूँ होवै कमळ, बिना चाँद ज्यूं
रात।
सूक्यो सारो सोरखै, मुरधर काळो गात॥
19॥
डांगर बांठां जाय, घरां ही रवै घणा है।
खोडां मेँ के खाय, तिणकला गिण्या-
गिण्या है।
खेजङलां री छांय भैँसङ्या नाख्यो हांगो।
पाणी-रा ऐ जीव हाल है खोटो आं-गो।
हांफतङी हूँ-हूँ करै है बण गरीब ज्यूं
गावङ्यां।
काळी मतवाळी बणैली बहन कळायण
बावङ्यां॥20॥

--
गंगासागर सारस्वत

कळायण उमस-ओग

मिनखां बिगङया म्हेँदरा थिगै जिनावर थाट।
पंछी उडै अबै-दरा, बंजङ बारा वाट॥1॥
दिन दोरा उमस-भरया काटां दुखङा देख।
'गिणतां घिसी आसाढ-नै आंगळियां री रेख' ॥2॥
कीकर-कैरां, कूमटां जङ-जाखङ, झुंडझांस।
वन बंजङ, बीहङ बळया फोगी, फोग, फरांस॥3॥
मुरधर मंगळ रूप, जठै जंगळ भळ भारी।
दंगळ धोरा, डैर, मैर मुरङा मझधारी।
दाइया भोमी-भाग अखङ भांती-रा सारा।
धोरा, डहरी, ताल, पाळ, परबत बेचारा।
भुरट, मुरट, धामण धरा ना, धूंधा धोरा घास है।
खीँपा, पीँपा फोगङा मेँ ठूंठा थोथा ठांस है॥4॥
बूठ कळायण! मुर-धरा पूरण आखी आस।
तो तूंठ्‌या रुङी रूतां, मोजां बारां मास॥5॥
होसी जेठू बाजरी, वासी मोभी पूत।
खासी दुनिया दूर-री, करे कळायण कूंत॥6॥
भोम मोम ज्यूं गळ रयी, उमस ओग अथोग।
ग्रीखम भावण रातङ्‌या दिवसां दाझै लोग॥7॥
चेतो कर चित मांय हरख-सूं आव हठीली।
बिरंगी-सी बणराय बणात रंग-रंगीली।
छैके हाली आव छबीली! देती ठेका।
मोरां मन हुळसाय मगेजण! सुणज्या केका।
घुरा नगारा गैरी घुळज्या उमस उनाळो मारणै।
जोङा झोळ झिळोळ भरणै आव कळायण! तारणै॥8॥
जेठ महीनै जोर-री चंचळ लू चाली।
नीर लुकायो लोयणां, ज्यूं ठीकर ठाली॥9॥
आख्यां आडो काच-सो, सूक्या आंसूङा।
बैठा झीणी झाङख्यां तिस मरता मिरगा॥10॥
बिरखां बिलखा सूवटा, मोर कूवटां केळ।
गायां छायां-छानङया,खोल्यां उभी खेळ॥11॥
हरया रवै ना रुँख, सूकग्या सगळा सारा।
हरी तुसर ना मिलै ओखदां-तणी तिवारां।
बाळक सैवे गोद डसाडस उमस-झाळां।
मात पळूसै माथ, पसेवो चाल्यो खाळां।
मूवा-सा बाळक हुवा है लाय लुवां-री ताप तळ।
मांचां पर बूढा-बढैरा सिसकै तपती बीच बळ॥12॥
उमस-ओग तन माणसां फुणसी-फोङा होय।
उधङ अळायां चमचमै, खाज खुसी री खोय॥13॥
टाबरिया भाज्या बगै झलती ताती लाय।
बळता पांव घसोङता पोटां मेँ चिरळाय॥14॥
छायां आयां छोकरा पग ठंडा कर लेय।
इसङी ताती धूङ-नै टाबर निकळै खेय॥15॥
घास नहीँ भर-पेट, भेङङ्‌या लौटे भूखी।
झट कोठा लै सोख, खेळियां कर दै सूखी।
सांडा टोडां टोळ टुळककर कूवै आया।
नीर मिलै तो मिलै, नहीँ तो रवै तिसाया।
गंडकङा गळियां फिरै है तिसिया ताप्या तावङै।
ऐ मौजां उण दिन करैला, जिण दिन वरसा बावङै॥16॥
झूरै जाझा जीवङा मुरधर बिन बरखा।
उझळ उनाझै ओग मेँ उण-मुण उणियारा॥17॥
आंचळ आंसू पूंछती नार्‌यां निरख निरख रही।
आसी अवस उडीक पर, सजनी! समझ सही॥18॥
बिन जळ ज्यूँ होवै कमळ, बिना चाँद ज्यूं रात।
सूक्यो सारो सोरखै, मुरधर काळो गात॥19॥
डांगर बांठां जाय, घरां ही रवै घणा है।
खोडां मेँ के खाय, तिणकला गिण्या-गिण्या है।
खेजङलां री छांय भैँसङ्या नाख्यो हांगो।
पाणी-रा ऐ जीव हाल है खोटो आं-गो।
हांफतङी हूँ-हूँ करै है बण गरीब ज्यूं गावङ्यां।
काळी मतवाळी बणैली बहन कळायण बावङ्यां॥20॥

मेरी अभिलाषा

पापा कहते बनो डॉक्टर
मां कहती इंजीनियर।
भैया कहते इससे अच्छा
सीखो तुम कम्प्यूटर।
चाचा कहते बनो प्रोफेसर
चाची कहती बनो अफसर।
दीदी कहती आगे चलकर
बनना तुम्हेँ कलेक्टर।
बाबा कहते फौज मेँ जाकर
जग मेँ नाम कमाओ।
दादी कहती घर मेँ रहकर
ही तुम उद्योग लगाओ।
सबकी अलग-अलग अभिलाषा
सबका अपना नाता।
लेकिन मेरे मन की उलझन
कोई समझ न पाता।

-शनू पाण्डेय

एक गजल

हम जिन से भी लङने निकले।
वे सब के सब अपने निकले।

वो तो मन मेँ ही बैठा था
जिसकी माला जपने निकले।

मेरी आँखो ने जो देखे
वे तेरे ही सपने निकले।

बस वे ही जिँदा रह पाए
कफन बांध के जो मरने निकले।

अणु परमाणु सभी तो घूमे
फिर तुम कहाँ ठहरने निकले।

जन्म हुआ तो मरना भी है
फिर हम किससे बचने निकले।

छोटे छोटे दु:ख-सुख ही
हम कविता मेँ रचने निकले।

-रमेश जोशी

Monday, 7 November 2011

मतीरो

मन ठंडो तन मोर, जन-जन जीधन सरस फळ।
मरुधर मिनख विभोर, माखण-छकण मतीरियाँ॥
वा:ला फळ बेजोङ, वागङ खेताँ वधमणा।
हरख करै कुण होङ, रसना मधुर मतीरियाँ॥
च्यारुँ रुत चौसार, ठंड ठरावै धूजणी।
भूख वैभकी मार, माङी जाण मतीरिया॥
कदै ना भूलै कोड, सीरे मनस्या, सेरणी।
हिवना हवै सरोढ, मधु सूं गरज मतीरियाँ॥
भूधर कितरो भार, जळ समदर रो तोल के?
वड मतीर मनवार, परब उमंगां ऊछबां॥
रळ रसना री राग, तन-मन माखण तरळ मछ।
जोग मतीरां जाग, मोळ भजण खण खुख खजण॥
कूंजा गिरी गुलाब, रोवां डोरां रस डबल।
अबल मतीरां आब, रतनां रळी बधावणा॥
छोल्या ओग उबाळ, मगज मतीरां री जयां।
तूम्बा रसना टाळ, मीठा बणै न ऊँट गळ॥
मैँणतियां री मौज, घर-घुसिया जाणै किसी।
खावै सुधियाँ खोज, ताँसू तोङ मतीरिया॥


स्व. गुरुदेव नानूराम जी सँस्कर्ता के काव्य 'दसदात' सूँ

हरयो खेत

आज हरिया खेतां मेँ छाँवला आवै
आभै लील गळै, वादळां री नौका कुण चलावै?
आज भँवरा फूलां नीँ बैठै; थाँरी जोत किरणा मेँ
मतवाळा ऊँचा उडै-चढै !
चातकङां रा जोङा, सरिता रै स्हारै कैयां भेळा होरया है?
साथीङा आज म्हैँ घर नीँ जावूँला।
आज म्हैँ आभै झाङ, विश्व विभव लूंटणो चावूं।
आज समदरियै री उछाळ मेँ झाग वणावूं; झंझावात-हरखीली हंसी हंसै!
आज बेवजै मुरळी बाजै-सारो दिन म्हैँ वै मेँ ही लगावूंला!

स्व. गुरुदेव नानूराम जी सँस्कर्ता की रचना 'गीतमाळा' सूं

काळी कांतळ

हरि! म्हारो हिङदै आज कळायण री गाज ले वगी।
कुण जाणै किरपा निधान, वा काळी रात कठै लेजा नाखसी?
मेघ मलार री बाजती वीणा माथै वैँ री चोट वीजळी-सी पिल पङै।
हिङदै मेँ वैँ रो अजर सरगम-वज्र ज्यूं गरजै!
टोकां री कतारां, जळद ऊमटै-उवारै घणघोर
अंधारे मनै चपेट ले लपेट्‌यो है।
मतवाळी वाय कुदङका मारै अर म्हारै संग
मेघ रंग बैवे उडती बगै ।

स्व. म. नानूराम जी सँस्कर्ता की रचना 'गीतमाळा' सूँ